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व्यथा-कथा : बलिया के लिए वरदान हैं सैलानी पक्षियाँ, कब तक होता रहेगा इनका शिकार : डॉ० गणेश पाठक
November 23, 2020 • परिवर्तन चक्र

बलिया : अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य पर्यवरणविद् डॉ० गणेश पाठक का कहना है कि पर्यटन करना मानव ही नहीं, बल्कि पशु- पक्षियों का भी नैसर्गिक गुण होता है। यह पर्यटन चाहें मनोरंजन की दृष्टि से किया जाए या स्वास्थ्यवर्द्धन की दृष्टि से अपने पसंद एवं मनोनुकूल वातावरण के क्षेत्रों में किया जाए। इसी क्रम में यदि देखा जाए तो पक्षियाँ भी पर्यटन करती हैं। खासतौर से बलिया के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो बलिया जिला के सुरहाताल सहित दहताल एवं अन्य तालों में विदेशी सैलानी पक्षियाँ बर्षा ऋतु के समाप्ति के पश्चात ठंढ शुरू होते ही अक्टूबर महीने से ही सुरहाताल को अपनी सैरगाह बनाने लगती हैं और पूरे जाड़ा भर यहाँ के वातावरण में रम जाती हैं। ये सैलानी पक्षियाँ सुरहाताल को न केवल अपना वास स्थान बना लेती हैं, बल्कि अपना भरपूर भरण- पोषण करते हुए अपनी प्रजनन क्रिया भी करती हैं और 15 मार्च के आस- पास ये स्वदेश रवाना होने लगती हैं।

सुरहाताल में खासतौर से उच्च अक्षांशों के शीत क्षेत्रों अर्थात् साईबेरियाई क्षेत्रों से आती हैं जो अति सुन्दर रंग - बिरंगी एवं मनोहारी होती हैं। ये पक्षियाँ विभिन्न तरह से कलरव एवं करतब करते हुए अति प्रिय एवं आकर्षक लगती हैं। इन पक्षियों लालशर, हंस, राजहंस, बत्तक, रंग- बिरंगे बगुले, तोते , बघेड़ी सहित अनेक प्रकार की पक्षियाँ होती हैं जो हजारों- हजारों की संख्या में झुण्ड बनाकर आती हैं। इसके साथ ही साथ अन्य क्षेत्रों से जैसे कुछ आस्ट्रेलियाई पक्षियाँ भी आती हैं। अपने देश के पर्वतीय क्षेत्रों से भी अनेक तरह की रंग- बिरंगी पक्षियाँ आती हैं।

वास्तव मे ये पक्षियाँ अपने वातावरण के अनुकूल प्रवास करती हैं। शीत क्षेत्रों में रहने वाली ये पक्षियाँ जब इनके यहाँ भयंकर ठंढ पड़ने लगती है और बर्फ गिरने लगती है तो ये इससे बचने के लिए मैदानी क्षेत्रों में प्रवास कर जाती हैं और जब मैदानी क्षेत्रों में गर्मी शुरू होती है तो ये अपने ठंढे क्षेत्रों में चली जाती हैं। आश्चर्य तो इस बात का है कि हजारों - हजारों किलोमीटर की यात्रा करने के बाद भी ये अपना रास्ता नहीं भूलती हैं और न ही अपना पर्यटन स्थल भूलती हैं। इनमें अनुशासन भी होता है और अपने समूह में अनुशासन से रहती हैं और यात्रा के दौरान भी अनुशासित होकर यात्रा करती हैं।

ये पक्षियाँ जिस क्षेत्र में भी जाती हैं वहाँ के पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को भी किसी तरह का नुकसान नहीं करती हैं, बल्कि संतुलन बनाए रखती हैं। किंतु कष्ट तो इस बात का है कि हमारा भरपूर मनोरंजन करने वाली एवं पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने वाली इन खूबसूरत बेजुबान सैलानियों का सम मानव दुश्मन बन गये हैं। जब ये पक्षियाँ आना शुरू करती हैं तभी से कुछ शरारती तत्व इनका शिकार करना प्रारम्भ कर देते हैं और जब तक रहती हैं, तब तक बेरोक- टोक चोरी - छुपे या सीनाजोरी से भी विभिन्न तरीकों से इनका शिकार जारी रहता है। यही नहीं यहाँ तक भी सुनने में आता है कि इन पक्षियों के अंडे तक भी नहीं छोड़े जाते हैं। ये पक्षियाँ इतनी समझदार हैं कि इन्हें अब अहसास हो गया है कि यह क्षेत्र उनके लिए अब सुरक्षित नहीं रह गया है। यही कारण है कि अब ये पक्षियाँ पहले की तुलना में कम आ रही हैं और इनकी विविधता में भी कमी आई है। बलिया के पर्यटन के लिए वरदान सिद्ध होने वाली इन सैलानी पक्षियों को कास हम बचा पाते।

इधर कुछ उम्मीद जगी है कि सुरहाताल एवं उषके चतुर्दिक रहने वाले जीव - जंतुओं एवं पक्षियों को शायद संरक्षण प्राप्त हो जाए। कारण कि सुरहाताल को अब इको क्षेत्र (पारिस्थितिकी क्षेत्र) घोषित कर दिया गया है, जिसके तहत सुरहाताल की सीमा से चतुर्दिक एक किलोमीटर के क्षेत्र में किसी भी प्रकार के जीव- जंतु एवं पक्षियों का शिकार करना अपराध माना जायेगा और उसके लिए दण्ड का भी प्राविधान है। यदि इसका कड़ाई से पालन हो तो शायद बलिया के बरदान इन सैलानी पक्षियों को बचाया जा सके।