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संत कबीर अपने कर्म से समाज की बुराईयाें काे निष्कासित किया : सुरेशचन्द्र जायसवाल
June 5, 2020 • परिवर्तन चक्र

रसड़ा (बलिया)। भारतीय पत्रकार संघ रसड़ा तहसील इकाई ने शुक्रवार काे स्थानीय छिताैनी के मैरेज हाल में संत कबीर जयंती उत्सव मनाया गया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि श्रीनाथ मठ के महंत काैशलेन्द्र गिरि जी व मुख्य अतिथि सुरेशचन्द्र जायसवाल रहे। महंत जी ने संत कबीर की व्याख्या करते हुए कहा कि संत कबीर एक ऐसे समाज सुधारक थे। जिन्हाेने अपने कर्म से समाज की बुराईयाें काे निष्कासित किया। मुख्य वक्ता प्रधानाचार्य अंजनी कुमार पाण्डेय ने कहा कि संत कबीर एक युग प्रवर्तक समाज सुधारक रहे। भक्तिकालीन कवि कबीर आज हम लाेगाें के बीच कर्म प्रधानता के आधार पर माैजूद हैं। वहीं गाेरखपुर क्षेत्र के हिन्दी प्रवक्ता अमित कुमार सिंह  ने कहा कि कबीर साक्षर नहीं शिक्षित थे। 

महात्मा कबीर समाज में फैले आडम्बरों के सख्त विरोधी थे। उन्होंने लोगों को एकता के सूत्र का पाठ पढ़ाया। वे लेखक और कवि थे। उनके दोहे इंसान को जीवन की नई प्रेरणा देते थे। कबीर ने जिस भाषा में लिखा, वह लोक प्रचलित तथा सरल थी। उन्होंने विधिवत शिक्षा नहीं ग्रहण की थी, इसके बावजूद वे दिव्य प्रभाव के धनी थे। 

कबीरदासजी को हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही संप्रदायों में बराबर का सम्मान प्राप्त था। दोनों संप्रदाय के लोग उनके अनुयायी थे। यही कारण था कि उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। 

किंतु इसी छीना-झपटी में जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा। यह कबीरजी की ओर से दिया गया बड़ा ही सशक्त संदेश था कि इंसान को फूलों की तरह होना चाहिए- सभी धर्मों के लिए एक जैसा भाव रखने वाले, सभी को स्वीकार्य। 

बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने तथा अपनी-अपनी रीति से उनका अंतिम संस्कार किया। ऐसे थे कबीर। इस माैके पर संगठन के अध्यक्ष रवि आर्य, संरक्षक संताेष सिंह, विनाेद शर्मा, सुमित गुप्ता, अखिलेश सैनी, शीबू श्रीवास्तव, आदित्य वर्मा के साथ अन्य लाेग रहे।