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प्राकृतिक संसाधनों एवं वनावरण की कमी से असंतुलित होती जा रही है पूर्वांचल की धरती : डॉ० गणेश कुमार पाठक
August 10, 2020 • परिवर्तन चक्र

वर्तमान समय में प्रकृति प्रदत्त सभी संसाधन मानव की भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन की गतिविधियों के कारण समाप्त होते जा रहे हैं एवं कुछ तो सदैव के लिए समाप्त भी हो गये हैं। जिसमें न केवल प्रकृति प्रदत्त खनिज संसाधन बल्कि पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के सभी कारकों सहित जैव विविधता भी समाप्त होती जा रही है, फलतः हमारी धरती पर प्राकृतिक असंतुलन बढ़ता जा रहा है एवं हमारी धरती विनाश के कगार पर खड़ी हो गयी है। इस विनष्ट होती प्रकृति को को बचाने में कहीं देर न हो जाए, अन्यथा पृथ्वी के सम्पूर्ण विनाश को रोकना किसी के बस की बात नहीं रह जायेगी। 

प्रकृति के विनष्ट होने का सबसे अहम् कारण यह है कि प्रकृति प्रदत्त जितने भी महत्वपूर्ण संसाधन रहें हैं, उनका उपयोग हमने  बिना सोचे-समझे अपनी विकासजन्य गतिविधियों एवं आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अतिशय दोहन एवं शोषण के रूपमें किया है, जिसके चलते अधिकांश प्राकृतिक संसाधन समाप्ति के कगार पर हैं. कुछ तो सदैव के लिए समाप्त भी हो गये हैं। हमारी गतिविधियों के कारण वन क्षेत्र निर्जन हो गये,  पहाड़ सपाट हो गये,  नदियाँ सूखती जा रही हैं,  जल संसाधन समाप्त होते जा रहे हैं.  इस तरह देखा जाय तो प्रकृति प्रदत्त सम्पूर्ण संसाधन ही समाप्त होते जा रहे हैं, जिसके चलते प्रकृति में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होती जा रही है। फलस्वरूप विविध प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं को लाकर प्रकृति भी हमसे बदला लेना प्रारम्भ कर दी है।  स्पष्ट है कि यदि प्रकृति पूर्णरूपेण रूष्ट होकर हमसे बदला लेना प्रारम्भ कर देगी तो उस स्थिति में इस धरा को बचाना ही मुश्किल हो जायेगा।

प्राकृतिक संसाधनों एवं वनावरण की बेहद कमी है पूर्वांचल में -
बलिया सहित पूर्वांचल के सात जिले प्राकृतिक संसाधनों से विहिन एवं वन विहिन क्षेत्र हैं। सोनभद्र, मिर्जापुर एवं चंदौली जिलों को छोड़ दिया जाय तो बाकी सात जिलों-बलिया, मऊ, आजमगढ़,गाजीपुर, जौनपुर, संत रविदासनगर एवं वाराणसी में न तो कोई प्राकृतिक संसाधन हैं और न ही प्राकृतिक वनस्पतियाँ हैं। प्राकृतिक वनों की स्थिति तो यह है कि इन सात जिलों में एक प्रतिशत से भी कम प्राकृतिक वनस्पतियाँ हैं। संसाधन के नाम पर एकमात्र जल संसाधन है।धरातलीय जल के रूपमें प्राप्त नदियाँ भी सूखती जा रही हैं। ताल- तलैया भी सुख गये हैं, जिन पर लोगों ने कब्जा कर रखा है।भूमिगत जल संसाधन की स्थिति भी बेहद खतरनाक स्थिति में है।

भूमिगत जल निरन्तर नीचे खिसकता जा रहा है एवं प्रदूषित भी होता जा रहा है। अनेक क्षेत्रों में भूमिगत जल डार्कजोन में आ गया है। इस तरह सम्पूर्ण पूर्वांचल का क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों की कमी एवं वनावरण की कमी के कारण पर्यावरणीय दृष्टि से अति असंतुलित है, जिसके चलते यह क्षेत्र कभी अनावृष्टि तो कभी अति वृष्टि, कभी सूखा तो कभी बाढ़, आँधी- तूफान, मिट्टी क्षरण, जल प्रदूषण, मिट्टी प्रदूषण, शीत लहर एवं ताप लहर जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है और इस क्षेत्र का विकास कुँठित हो गया है। इस तरह यह पूर्वांचल का क्षेत्र भी प्राकृतिक संसाधनों की कमी एवं पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी असंतुलन से अछूता नहीं है।

आखिर कैसे हो इनका समाधान-

प्रकृति को सुरक्षित एवं संरक्षित रखने  लिए हमें येन- केन - प्रकारेण पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के कारकों, जैव विविधता एवं प्राकृतिक संसाधनों को विनष्ट होने से बचाना होगा। यह मात्र किसी सरकार ,उद्योगपति या नागरिक की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें सबकी भागीदारी सुनिश्चित होना चाहिए और प्रकृति के विनाश से होने वाले दुष्परिणामों से आम जनता को जागरूकता के माध्यम से अवगत कराना चाहिए।

आज हमें भारतीय चिन्तन एवं भारतीय संस्कृति में निहित अवधारणाओं को पुनः पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। भारतीय चिन्तन परम्परा में पूरी प्रकृति के संरक्षण हेतु संकल्पनाएँ  प्रस्तुत की गयी हैं। भारतीय संस्कृति अरण्य संस्कृति रही है। हम प्रकृति की छत्रछाया में रहे हैं। प्राकृतिक अनुराग एवं प्रेम हमारे कण- कण में रचा- बसा है। यही कारण है कि अभी हम कुछ हद तक सुरक्षित है।

हमारी भारतीय संस्कृति में निहित अवधारणाएं इतनी इतनी उपयोगी एवं सबल हैं कि उनका पालन कर हम प्रकृति का संरक्षण कर सकते हैं और कर भी रहे हैं। हमारी संस्कृति, सभ्यता, आचार, विचार , व्यवहार, परम्पराएँ, रीति- रिवाज , हमारी दिनचर्या ऐसी है कि अगर हम उसके अनुसार रहें तो निश्चित ही प्रकृति को हम सुरक्षित एवं संरक्षित कर प्राकृतिक संसाधनों को बचा सकते हैं।

जहाँ तक प्राकतिक रूप से धरती को बचाने की बात है तो कोरोना ने सारी मानवीय गतिविधियों को जिस तरह से रोक दिया है, उससे पर्यावरण के कारकों में काफी सुधारात्मक लक्षण देखने को मिल रहे हैं। इससे इस बात की तो पुष्टि हो ही जा रही है कि हम प्रकृति के कारकों से जितना ही कम छेड़ - छाड़ करेंगे, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो हमारी संस्कृति में ही माता 'भूमिः पुत्रोअहम् पृथ्विव्याः' की अवधारणा निहित है, जिसके तहत हम पृथ्वी को अपनी माता मानते हैं और अपने को पृथ्वी माता का पुत्र। इस संकल्पना के  तहत हम पृथ्वी पर विद्यमान प्रकृति के सभी तत्वों की रक्षा करते हैं। यदि हम भारतीय संस्कृति में निहित अन्य अवधारणाओं को देखें तो प्रकृति के सभी कारकों की रक्षा एवं सुरक्षा की अलग- अलग संकल्पना हमारे प्राचीन ग्रंथों में भरी पड़ी है। हम तो प्रारम्भ से ही प्रकृति पूजक रहे हैं। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के सभी जैविक एवं अजैविक कारकों के संरक्षण की बात की गयी है और उसके लिए विधान बनाकर हमारी जीवनचर्या से उसे जोड़ दिया गया है, ताकि हम उनका नियमतः पालन करते रहें। इसी लिए अभी प्रकृति के अधिकांश अवयव हमारे यहाँ सुरक्षित हैं।हम भगवान की पूजा करते हैं और भगवान मतलब – भ = भूमि, ग = गगन, व = वायु, अ = अग्नि एवं न = नीर होता है। अर्थात् प्रकृति के पाँच मूलभूत तत्वों की पूजा ही हम भगवान के रूप में करते हैं। 

प्रकृति संरक्षण हेतु हमें अपनी आवश्यकताओं को भी कम करना होगा। भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन का त्याग करना होगा। कहा भी गया है- "अपनी आवश्यकताओं को कम रखें, सुखी रहेंगें"। यह भी कहा गया है कि "उती पाँव पसारिए, जाती तोरी ठाँव। अर्थात् उतना ही पैर फैलाना चाहिए, जितनी बड़ी चादर हो। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे पास जितना संसाधन हो, उसी के अनुरूप उसका उपयोग करना चाहिए। यदि हम अपनी आवश्यकता से अधिक उपयोग करेंगे तो संसाधन जल्द ही समाप्त हो जायेंगे और फिर हमें कष्ट का सामना तो करना ही पड़ेगा।

किन्तु कष्ट इस बात का है कि हम पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगते हुए अपनी मूल अवधारणाओं को भूलते गए और अंधाधुन्ध विकास हेतु प्रकृति के संसाधनों का अतिशय दोहन एवं शोषण करते गए, जिससे समारे देश में भी प्राकृतिक संतुलन अव्यवस्थित होता जा रहा है और हमारे यहाँ भी संकट के बादल मँडराने लगे हैं। आज आवश्यकयता इस बात की है कि हम अपनी सनातन भारतीय संस्कृति की अवधारणा को अपनाते हुए विकास की दिशा सुनिश्चित करें, जिससे विकास भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित एवं संतुलित रहे। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब हमारा भी विनाश अवश्यम्भावी हो जायेगा और हम अपना विनाश अपने ही हाथों कर डालेंगे और अन्ततः कुछ नहीं कर पायेंगें।

जहां तक पूर्वांचल क्षेत्र के संतुलित विकास की बात है तो संसाधन विहीन एवं वनावरण विहीन, किन्तु कृषि प्रधान इस क्षेत्र में अवथापनात्मक संरचनाओं का संतुलित विकास कर कृषि आधारित उद्योगों को विकसित करने की आवश्यकता है, जिसमें संसाधन भी स्थानीय हो एवं उसमें कार् करने वाले भी स्थानीय हों। कृषकों के उत्पाद को  बिना बिचौलिए के सीधे औद्योगिक प्रतिष्ठानों में भेजने एवं  उसका भुगतान करने की व्यवस्था हो। बाजार की व्यवस्था में भी कृषकों की सहभागिता सुनिश्चित हो। उद्योगों में कामगार भी स्थानीय स्तर पर ही लिए जाएँ तो निश्चित ही इस क्षेत्र का विकास होगा।