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पाताल से आ रहा है मौत का जलजला, आसमान से भी है कनेक्शन
June 9, 2020 • परिवर्तन चक्र

नई दिल्ली: दिल्ली एनसीआर सहित दुनिया के कई इलाकों में धरती कांप रही है. भूकंप के कई झटके आ चुके हैं. जिसे देखते हुए वैज्ञानिकों ने आशंका जाहिर की है कि भूकंप के ये झटके गंभीर रुप लेते हुए किसी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकते हैं. धरती पर आने वाले इस संभावित जलजले का कनेक्शन आकाश के साथ साथ पाताल से भी है.

किसी बड़े हादसे का संकेत हैं भूकंप के लगातार झटके
देश में पिछले कुछ दिनों से लगातार भूकंप के झटके आ रहे हैं. जो कि धरती के अंदर किसी बड़ी हलचल का संकेत दे रहे हैं. निकट भविष्य में ये भूचाल के किसी बड़े हादसों का कारण बन सकते हैं. 

IIT (इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) के शोधकर्ताओं ने आशंका जाहिर की है कि दिल्ली-एनसीआर (Delhi NCR) इलाके में जल्दी ही किसी बड़े भूकंप की आशंका है. 

आईआईटी धनबाद के सीस्मोलॉजी डिपार्टमेंट के प्रमुख पीके खान की रिसर्च के मुताबिक हरिद्वार से लेकर दिल्ली एनसीआर रिज इलाका 8.5 रिक्टर स्केल के किसी बड़े भूकंप का निशाना बन सकता है. उन्होंने आशंका जताई है कि इस भूकंप का केंद्र हिमाचल का कांगड़ा या फिर उत्तराखंड का उत्तरकाशी हो सकता है. 

पिछले दो सालों में दिल्ली एनसीआर इलाके में 4 से 5 रिक्टर स्केल के लगभग 64 और पांच से ज्यादा रिक्टर स्केल के आठ (8) झटके देखे गए हैं. जो यह बताते हैं कि भूगर्भीय ऊर्जा एक जगह संघनित हो रही है. जो किसी बड़े भूचाल का कारण बन सकती है. 

गंभीर खतरे में है राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उसके आस पास का इलाका (Delhi NCR) गंभीर संकट में है. वैसे तो भारत का लगभग 59% भू-भाग भूकंप सम्भावित क्षेत्र माना जाता है. लेकिन दिल्ली-एनसीआर का इलाक़ा सीस्मिक ज़ोन-4 में आता है. यहां धरती के अंदर हलचलें तेज रहती हैं. 

वैज्ञानिकों ने भूकंप सम्भावित क्षेत्रों के पांच सीस्मिक ज़ोन बनाए हैं. जिसमें से जोन-1 में भूकंप आने की आशंका सबसे कम और ज़ोन-5 में सबसे प्रबल रहती है. दिल्ली से थोड़ी दूर स्थित पानीपत इलाक़े के पास भूगर्भ में फॉल्ट लाइन मौजूद है. किसी भी बड़े भूकंप की रेंज 250-350 किलोमीटर तक पहुंचती है.

दिल्ली एनसीआर की 70 से 80 फीसदी इमारतें भूकंप का औसत से बड़ा झटका झेल पाने की स्थिति में नहीं हैं. पिछले कई दशकों के दौरान दिल्ली के यमुना पार और नोएडा इलाके में हाई राइज बिल्डिंगों का चलन बढ़ा है. जो कि ज्यादा खतरनाक हैं. इन इलाकों में बड़ी मानव आबादी रहती है. जबकि इसमें से अधिकांश इमारतों के निर्माण से पहले नींव की मिट्टी की पकड़ की मजबूती की जांच नहीं की गई है. 

दिल्ली में तबाही मचा चुका है भूकंप 

दिल्ली में 300 साल पहले भी भूकंप तबाही मचा चुका है. 15 जुलाई 1720 को दिल्ली में भयानक भूकंप आ चुका है. आज 300 साल बाद वैसा ही इतिहास दोहराए जाने की आशंका है. 

300 साल पहले आए इस भूकंप का वर्णन 1883 में प्रकाशित जर्नल 'द ओल्डहैम्स कैटालॉग ऑफ़ इंडियन अर्थक्वेक्स' में मिलता है. उस समय का ये भूकंप रिक्टर पैमान पर 6.5 से 7.0 के बीच का था. जिसकी वजह से वर्तमान पुरानी दिल्ली इलाके में भारी तबाही हुई थी. 

लेकिन इस बार जो भूकंप आने की आशंका है वो 8.5 रिक्टर स्केल का है. जो भारी तबाही का कारण बन सकता है. क्योंकि उस समय से अभी तक आबादी का घनत्व कई गुना बढ़ गया है और भूकंप की तीव्रता भी ज्यादा होने की आशंका है.

अंतरिक्ष से मिल रहा है तबाही का संकेत

साल 2020 में भूकंप की आशंका इसलिए भी है क्योंकि इस समय आसमान में सूरज मद्धम पड़ा हुआ है. सोलर मिनिमम का काल चल रहा है. इस दौरान सूरज का चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) कमजोर हो गया है. जिसकी वजह से सौरमंडल के दूसरे हिस्सों से कॉस्मिक किरणें हमारे सोलर सिस्टम में आ रही हैं. इन कॉस्मिक किरणों की वजह से धरती के भूगर्भ में बदलाव आ रहे हैं. जो बड़े बदलाव का कारण बन रहे हैं.

200 साल पहले हुए सोलर मिनिमम के दौरान 10 अप्रैल 1815 को इंडोनेशिया के माउंट टंबोरा में भीषण ज्लावामुखी विस्फोट हुआ था. जिसकी वजह से उस समय 71 हजार लोग मारे गए थे. उस समय भी सोलर मिनिमम के दौरान अंतरिक्ष की कॉस्मिक किरणों के धरती के पास आने की वजह से भूगर्भीय बदलाव हुए थे. 

धरती के अंदर से भी मिल रहे हैं तबाही के संकेत
शोधकर्ताओं ने दिल्ली एनसीआर इलाके के पास दिल्ली-हरिद्वार रिज फॉल्ट लाइन की प्लेट में प्रतिवर्ष 44 मिलीमीटर का मूवमेन्ट दर्ज किया है. ये पिछले दिनों आए भूकंप के झटकों का कारण बन रहा है. ये मूवमेन्ट संकेत दे रहा है कि किस प्रकार धरती के नीचे स्ट्रेन एनर्जी बढ़ती जा रही है. जो कि आने वाले भविष्य में बड़े भूकंप के झटके का कारण बन सकती है. 

इसके अलावा एक रिसर्च से पता चला है कि हिंद महासागर के नीचे भारत-ऑस्ट्रेलिया-कैपरीकॉर्न टेक्टोनिक प्लेट धीरे धीरे टूटती जा रही है. जिसकी वजह से बड़ी उथल-पुथल मच सकती है. इसके टूटने की रफ्तार 0.06 यानी 1.7 मिली मीटर प्रतिवर्ष है. शोधकर्ता ऑरेली कॉड्यूरियर ने ये महत्वपूर्ण रिसर्च की है.

धरती और आसमान से मिल रहे इन संकेतों से पता चलता है कि धरती पर जल्दी ही भूकंप तबाही मचा सकता है. इसी के बारे में शोधकर्ताओं ने संकेत दिए हैं. 

साभार-जी न्यूज