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नरेंद्र मोदी जी के जन्मदिन पर विशेष : कदम जमीन पर और भरोसा आसमान पर
September 17, 2020 • परिवर्तन चक्र • देश

दीपक चौरसिया-

मोदी जी की दिल्ली में तो कोई जान-पहचान थी ही नहीं और न ही कोई ठिकाना था. उनका ज्यादातर वक्त 11 अशोका रोड पर ही बीतता था. भोजन का इंतजाम बीजेपी की कैंटीन से हो जाता था.

नई दिल्‍ली। बात साल 1996 की है. तब मैं खबरों के सिलसिले में बीजेपी मुख्यालय 11 अशोका रोड पहुंचा था. ये वह दौर था जब दिल्ली में लोकसभा चुनाव की गहमागहमी चरम पर थी. वहीं पर मेरी मुलाकात नरेंद्र मोदी से हुई. आधे बाजू वाला लंबा कुर्ता, चूड़ीदार पायजामा पहने हुए नरेंद्र मोदी की दाढ़ी में जहां-तहां सफेदी झांकनें लगी थी. बेहद शांत, सौम्य लेकिन संगठन के काम में माहिर नरेंद्र मोदी तब हाल में ही गुजरात से दिल्ली आए थे और बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव के रूप में उन्हें संगठन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. किसी के लिए वह नरेंद्र भाई थे, तो किसी के लिए मोदी जी. उस दौर के बीजेपी के दिग्गज नेताओं के बीच 46 साल के नरेंद्र मोदी पार्टी के भविष्य के रूप में देखे जाने लगे थे. संगठन के मामलों में थिंकटैंक. यह रुतबा उन्हें प्लेट में परोसकर नहीं मिला था. दिल्ली आने से पहले वह गुजरात में अपनी चुनावी रणनीति की काबिलियत का लोहा मनवा चुके थे, लेकिन दिल्ली की राजनीति में उन्हें पैठ बनाना अभी बाकी था.

मोदी जी की दिल्ली में तो कोई जान-पहचान थी ही नहीं और न ही कोई ठिकाना था. उनका ज्यादातर वक्त 11 अशोका रोड पर ही बीतता था. भोजन का इंतजाम बीजेपी की कैंटीन से हो जाता था. दरअसल बीजेपी के सचिव के तौर पर उन्हें 11 अशोका रोड पर एक कमरा मिल गया था. इस कमरे की भी अलग कहानी थी. दरअसल बीजेपी दफ्तर दिल्ली के लुटियन ज़ोन के जिस बंगले में था, उसमें सर्वेंट क्वार्टर में बदलाव करके कुशाभाऊ ठाकरे और के. एन. गोविंदाचार्य के लिए कमरें बना दिए गए थे. उसी के पास एक कमरा नरेंद्र मोदी का दफ्तर बना, जहां उनका पूरा दिन और कई बार रात भी बीत जाती थी. बाद में जब अरुण जेटली राज्यसभा सदस्य बने, तब उन्हे अशोका रोड का ही बंगला नंबर 9 आवंटित कर दिया गया. 1997 में मोदी जी 9 अशोका रोड में शिफ्ट हो गए. यह वही वक्त था जब अटल बिहारी वाजपेयी 13 दिनों के लिए पहली बार प्रधानमंत्री बने थे. जोड़-तोड़ और बीजेपी विरोध राजनीति की वजह से वाजपेयी सरकार गिर जाने के बाद भी 11 अशोका रोड ही देश की सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका था. यहीं से देश की राजनीति के जटिल समीकरणों को मोदी जी ने समझना और साधना शुरू किया.

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब साल 1998 में नरेंद्र मोदी का बीजेपी संगठन में महामंत्री के तौर पर प्रमोशन हुआ, तब मैं उनके साथ ही बैठा हुआ था. उसी साल अप्रैल में कुशाभाऊ ठाकरे को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था. हालांकि उनकी टीम यानि बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सूची तब तक घोषित नहीं हुई थी, लेकिन मुझे अपने सूत्रों से जानकारी मिल चुकी थी कि मोदी जी को संगठन का महामंत्री बनाया जा रहा है. मैंने मोदी जी को इसकी बधाई दी. उन्होंने तब चिर-परिचित सौम्य लहजे में सिर्फ यही कहा-'जिस पद पर कुशाभाऊ ठाकरे और सुंदर सिंह भंडारी जैसे दिग्गज रहे हों, उस पद पर मुझे बिठाया जा रहा है. मेरी अब तक की जिंदगी की यह सबसे बड़ी उपलब्धि है.'

वर्तमान माहौल में मुझे नरेंद्र मोदी के उस दौर की बातें याद आती हैं, तो हैरानी होती है कि मोदी जी के बारे में उनके विरोधियों के मन में इतनी गलतफहमी क्यों है? 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त से ही मोदी जी के आलोचक यही आरोप लगाते रहे हैं कि वह 'एकला चलो रे' की नीति पर चलते हैं. अपनी बात को ही अंतिम सत्य और पत्थर की लकीर समझते हैं. मोदी जी के विरोधियों को लगता है कि वह गठबंधन में कभी नहीं चल सकते. अब पता नहीं ऐसे लोगों की आंखों पर मोदी विरोध की पट्टी बंधी है या कुछ और बात है. ऐसी सोच रखने वालों को शायद यह नहीं पता कि मोदी जी ने बीजेपी संगठन में अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा के प्रभारी के तौर पर की थी. इन राज्यों में बीजेपी के गठबंधन के सूत्रधार वहीं थे. पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के साथ उन्होंने बीजेपी का गठबंधन बनाया और गठबंधन की सरकार भी चलाई.

अब भी वहां बीजेपी और शिरोमणि अकाल दल का गठबंधन मजबूत है. हरियाणा में 1996 में बंसीलाल की हरियाणा विकास पार्टी और तीन साल बाद 1999 में बंसीलाल के घोर विरोधी देवीलाल और उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल के साथ बीजेपी का गठबंधन मोदी जी की बदौलत ही था. जम्मू-कश्मीर में फारुख़ अब्दुल्लाह की पार्टी को एनडीए का हिस्सा बनाने का करिश्मा भी मोदी जी के संगठन महामंत्री रहते हुए ही संभव हुआ था. हिमाचल प्रदेश में पंडित सुखराम के साथ बीजेपी ने सरकार बनाई भी और चलाई भी. 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने की गठबंधन की सरकार में भी संगठन की पूरी जिम्मेदारी मोदी जी के हाथों में ही थी. जो लोग बीजेपी को जानते हैं, उन्हें यह बात समझ में आती है कि गठबंधन जैसे नीतिगत मामलों में पार्टी के संगठन महामंत्री की भूमिका क्या होती है.

मेरी दृष्टि में मोदी जी की तीन खूबियां थीं, जो उन्हें बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति में समकालीन नेताओं से अलग बनाती थीं. पहली यह कि उन्होंने तकनीक पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया था. बीजेपी दफ्तर का कंप्यूटरीकरण और पार्टी की वेबसाइट उन्हीं की देन थी. दूसरा ये कि वह हर चीज की डिटेलिंग में जाते थे. बारीक से बारीक बिंदु, छोटी से छोटी बात पर उनकी पैनी नजर रहती थी, आज भी है. दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय में काम करते समय उनके पास संगठन और पार्टी सचिव, दोनों पदों की जिम्मेदारी थी. तब मैंने कई बार करीब से देखा कि किसी भी चुनाव या कार्यक्रम की योजना बनाते हुए वह इस बात का भी ख्याल रखते थे कि अगर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सौ लोग आ रहे हैं, तो सौंवी कुर्सी कैसे लगेगी और पांच कुर्सियां अतिरिक्त कहां लगाई जा सकेंगी? तीसरा, सम-सामयिक विषयों उनका गहराई से अध्ययन और दूरदर्शी नजरिए से उनका विश्लेषण करने की क्षमता. उनकी एक खासियत यह भी मैंने महसूस की थी कि किसी भी विषय पर आप उनसे तुरंत तर्क कर सकते हैं. ऐसे कई मौके आए जब किसी विषय पर चर्चा शुरू हुई तो उनका नजरिया अलग था, लेकिन अगर तर्कों से मैं उन्हें संतुष्ट कर सका तो वह मेरी बात मानने को भी तैयार हो जाते थे. सिर्फ कहने के लिए नहीं, तर्कों से निरुत्तर होने की वजह से नहीं, बल्कि दिल से वह किसी भी तार्किक बात को स्वीकार करने में कभी भी नहीं हिचके.

ये सब जानते हैं कि पार्टी के महासचिव और संगठन के महामंत्री के तौर पर उन्हें गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपे जाने की जानकारी, मेरे प्रिय साथी रहे गोपाल सिंह बिष्ट के अंतिम संस्कार में मिली. भाई गोपाल बिष्ट माधवराव सिंधिया के साथ हवाई यात्रा में दिवंगत हो गए थे. महासचिव और संगठन के महामंत्री के तौर पर मोदी जी ने अपने संपर्क में आए हर इंसान से व्यक्तिगत संबंध बनाए थे. उन्हीं संबंधों की वजह से वह श्मशान घाट पर थे, जब उन्हें गुजरात जाकर सरकार की बागडोर संभालने के लिए कहा गया. मुझे दो वाकये याद आते हैं जब उनके फोन या उनके आगमन ने मुझे चौंका दिया था. मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है कि वह दशहरे के दिन थे. जर्मनी से आई मेरी एक विदेशी मित्र ने गरबा देखने की इच्छा जताई थी. मैं उनको गरबा दिखाने के लिए दिल्ली की गुजराती सोसायटी के पंडाल में ले गया था. मेरे पास अगले ही दिन सुबह-सुबह उनका फोन आया छूटते ही बोले , 'क्यों भाई गरबा खेल लिया आपने'. मुझे इस बात से हैरानी हुई कि नरेंद्र मोदी को इसकी भी खबर थी. उन्हें खबर कैसे लगी यह पता नहीं.

संबंधों के निर्वहन के लिए नरेंद्र मोदी ने मीलों की दूरी तय की
दूसरा मौका मेरे विवाह का था. शादी की तारीख से कुछ दिन पहले ही मोदी जी अमेरिका यात्रा पर गए हुए थे. मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह मेरी शादी में आ पाएंगे, लेकिन मेरे विवाह की जानकारी मिलने के बाद वह अपनी अमेरिका यात्रा को समय से पहले ही खत्म करके एक दिन पहले ही दिल्ली लौट आए थे. संबंधों के निर्वाह के लिए मीलों आगे बढ़ने का ऐसा अंदाज मैंने मोदी जी के कद के किसी नेता में शायद ही कभी देखा हो. उनकी एक और बात पर मुझे ताज्जुब होता है. उनकी स्मरण शक्ति इतनी जोरदार है कि वह सालों पहले मिले किसी व्यक्ति को उसका नाम लेकर ही पुकारते हैं. कोई दूर-दूर से भी कभी उनके संपर्क में आ जाए, तो वह मोदी जी का अपना हो जाता है, सदा के लिए.

उनका व्यावहारिक और प्रशासनिक अनुभव कितना है, इसका अंदाजा मुझे गुजरात के भूकंप के समय हुआ. उन्हें सीएम बने अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे. कच्छ और भुज समेत गुजरात के बड़े हिस्से में विनाशकारी भूकंप की सूचना मिलते ही मैं तबके गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी के साथ विशेष विमान में 26 जनवरी 2001 को कुछ घंटे बाद ही अहमदाबाद में था. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी भी साथ में थे. भूकंप प्रभावित इलाकों में हालात भयावह थे. अगले एक महीने मैंने गुजरात में ही बिताए. इस दौरान मोदी जी से कई बार मुलाकात हुई, बात भी हुई. उन्हें हर इलाके की पूरी जानकारी थी कि कहां कितनी तबाही है और कहां राहत के लिए क्या जरूरी है. उस दौरान मदद के लिए आम लोग और सामाजिक संस्थाएं खुलकर हाथ बंटा रहीं थीं, लेकिन एक दिक्कत थी कि ज्यादातर लोग खाने के पैकेट और कपड़े ही भेज रहे थे.

भूकंप पीड़ितों की दूसरी जरूरतों की तरफ किसी का ध्यान ही नहीं था, सिवाए मोदी जी के. उन्होंने राहत और पुनर्वास के लिए ऐसे जरूरी सामानों की लिस्ट बनाई, जिनको नजरअंदाज किया जा रहा था. उन्होंने एनजीओ को लिस्ट भेजी और गुजारिश की कि इनकी व्यवस्था करें. उसी दौर में कच्छ के पुनर्निर्माण का उन्होंने ऐसा ब्लूप्रिंट तैयार किया था, जो 2001 के समय से बहुत आगे का था. आज अगर आप कच्छ के इलाके में जाएं, तो यकीन करना मुश्किल होगा कि यह वही कच्छ है, जो 2001 के भूकंप से खंडहर बन चुका था. आज वहां की जो तस्वीर है उसकी कल्पना मोदी जी ने की थी और लोगों को उम्मीद से भी पहले उसे साकार कर दिखाया था.

भूकंप के एक साल बाद ही साल 2002 में गुजरात चुनाव से पहले दंगों की आग में झुलस रहा था. पूरा मीडिया एकतरफा नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा हो गया था. मेरी उनसे मुलाकात एक पुराने चैनल की कैंटीन में हुई, जहां पर वह इंटरव्यू देने के लिए आए थे. उस वक्त अयोध्या की गतिविधियां भी चरम पर थीं और उसी में उलझने की वजह से मैं गुजरात दंगों के वक्त रिपोर्टिंग के लिए बहुत ज्यादा नहीं जा पाया था. मैंने उनसे पूछा कि क्या हालात वाकई ऐसे ही हैं, जैसा कि कुछ चौबीस घंटे के चैनल चला रहे हैं? उन्होंने कहा- 'अगर कुछ घटनाओं को अलग-अलग तरीके से 24 घंटे लगातार चलाया जाए, तो और क्या होगा?' वह इस बात से बेहद आहत थे कि कुछ बड़े पत्रकार एजेंडे के तहत उन पर हमलावर हैं.

गुजरात के बारे में देशभर में ऐसा माहौल बना दिया गया कि मोदी सरकार वहां ज्यादा दिनों तक नहीं टिकेगी, लेकिन उन्होंने तब भी ये साबित किया कि वो सैटेलाइट चैनलों की ओर से रचे जा रहे संसार पर नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई पर भरोसा करते हैं. इसमें कोई शुबहा नहीं कि मोदी जी इस कला के माहिर हैं कि अपने खिलाफ चल रहे एजेंडे को अपने पक्ष में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है. उन्होंने 2002 के दंगों के बाद विपरीत परिस्थितियों में गुजरात और गर्वी गुजरात का ऐसा नारा दिया कि गुजरात की राजनीति में वह अपरिहार्य हो गए. गुजरात की जनता ने मान लिया कि दंगों के बहाने मोदी को नहीं बल्कि गुजरात को बदनाम किया जा रहा है. इसलिए नरेंद्र मोदी को गुजरात की जनता ने अपनी आन-बान और शान का प्रतीक मान लिया.

विदेशों में बसे भारतवंशियों से नरेंद्र मोदी के अच्छे ताल्लुकात 
बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि अमेरिका के मैडिसन स्कायर गार्डन से मोदी ने विदेशों में बसे भारतवंशियों के जिन कार्यक्रमों में हिस्सा लेना शुरू किया, वे कार्यक्रम भारत सरकार के कम, मोदी जी के बरसों पहले विदेशों में बनाए अच्छे संबंधों का नतीजा है. शायद ही कोई देश ऐसा हो, जहां कई भारतवंशी परिवारों को वह निजी तौर पर ना जानते हों. विदेशों में उन्होंने ये संबंध बीजेपी के सामान्य कार्यकर्ता रहने के दौरान ही बनाए थे और उन संबंधों को आजतक निभाते रहे. उन संबंधों और संपर्कों को वह गुजरात के सीएम और अब भारत के पीएम के तौर पर भी नहीं भूले. लगातार दो लोकसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत हासिल करके मोदी जी ने यह भी साबित किया कि वह गुजरात के बाद देश के लिए भी अपरिहार्य बन चुके हैं. अच्छी तरह सोच-विचार करके कड़े फैसले करने की उनकी क्षमता की कायल पूरी दुनिया हो चुकी है. पाकिस्तान पर सर्जिकल और एयर स्ट्राइक जैसे कड़े कदमों को उन्होंने पहली पारी में ही अंजाम दे दिया था.

अपनी दूसरी पारी में उन्होंने ऑर्टिकल 370 को हटाने, तीन तलाक को खत्म करने और राम मंदिर निर्माण का रास्ता प्रशस्त करने जैसे ऐतिहासिक कदम उठाए. इसकी योजना वे साल 2014 से ही तैयार करने लगे थे. नागरिकता संशोधन कानून, ऑर्टिकल 370 और धारा 35ए हटाने का मसौदा पिछली सरकार में ही तय कर लिया गया था. इन पर अमल करने के लिए वह दूसरे जनादेश का इंतजार कर रहे थे, ताकि भारत की जनता इन फैसलों को राजनीतिक स्वार्थ के नजरिए से लिया गया फैसला ना समझे. उन्हें देश की जनता पर भरोसा था, शायद इसीलिये वह जनता का भरोसा दूसरी बार ज्यादा बड़े बहुमत से जीत पाए. मोदी ने भारतीय राजनीति में इतनी बड़ी लकीर खींच दी है कि उसे मिटाने या उससे लंबी लकीर खींचने में किसी भी राजनेता को बहुत पापड़ बेलने पड़ेंगे. अब कोई भी पद मोदी के कद के आगे छोटा है. ये तथ्य उनके विरोधी भी स्वीकार करते हैं, और इतना तो आप भी मानेंगे कि इतना बड़ा कद उसी का हो सकता है, जिसका व्यक्तित्व पारदर्शी हो, जिसकी कथनी और करनी में कोई फ़र्क ना हो.

साभार-दीपक चौरसिया (न्यूज नेशन)