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कोरोना काल में लाँकडाउन ने दिया पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को संजीवनी : डा० गणेश पाठक
July 16, 2020 • परिवर्तन चक्र

बलिया। कल 14 जुलाई को एम. एम. टी. डी. कालेज बलिया के जन्तु विज्ञान विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार " कोविद- 19: मिथक एवं सच्चाई" में रिसोर्स परसन के रूप में अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य एवं समग्र विकास तथा शोध संस्थान के सचिव पर्यावरणविद् डा० गणेश कुमार पाठक ने " कोविद- 19 का पर्यावरण पर प्रभाव" नामक विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि कोरोना वायरस से बचाव हेतु पूरे विश्व में जो लाँकडाउन लगाया गया उससे कोरोना को भगाने में तो सकारात्मक प्रभाव पड़ा ही , सबसे सकारात्मक प्रभाव पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के सुधार पर पड़ा। 

डा० पाठक ने बताया कि लाँकडाउन के दौरान सभी मानवीय गतिविधियाँ जैसे- उद्योग धंधों के कल - कारखाने, सभी प्रकार के परिवहन संचालन, आर्थिक क्रियाएँ एवं सभी प्रकार की उत्पादन क्रियाएँ बंद हो गयीं। मानव अपने घरों में दुबक कर रह गया, जिसके चलते पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के सभी अवयव स्वतंत्र रूप से अपने को विकसित करने में लग गये,जिससे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी में जो असंतुलन व्याप्त हो गया था, उसका काफी हद तक सुधार हो गया तथा पर्यावरण शुद्ध होकर स्वच्छ एवं साफ हो गया। लाँकडाउन ने पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को एक नयी संजीवनी प्रदान किया।

डा० पाठक ने बताया कि  लाँकडाउन के दौरान सभी उत्पादन क्रियाएँ, कल- कारखाने एवं परिवहन व्यवस्था बंद हो जाने से जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण एवं ध्वनि प्रदूषण में भी काफी कमी आ गयी। नदियों का जल, खासतौर सज गंगा, यमुना एवं सरयू नदियों का जल काफी शुद्ध एवं स्वच्छ हो गया और उसमें निवास करने वाले जलीय जीव भी स्वच्छ जल में विचरण करते हुए स्पष्टतया दिखाई देने लगे।

डा० पाठक ने बताया कि लाँकडाउन से केवल जल, वायु एवं ध्वनि प्रदूषण ही कम नहीं हुआ , बल्कि उद्योगों के बंद होने एवं परिवहन साधनों के बंद हो जाने से विषैली ग्रीन हाउस गैसों का भी उत्सर्जन नहीं के बराबर हुआ। जैसे कार्बन- डाई- आँक्साईड, सल्फर-डाई- आँक्साईड, सल्फर -मोनो- आँक्साईड, मीथेन आदि विषैली गैसों का उत्सर्जन न होने से एवं वायुमण्डल में इनके नहीं पहुँचने से पूरा वायमंडल स्वच्छ हो गया और दृश्यता बढ़ गयी। यही नहीं ध्रुवीय क्षेत्रों में ओजोन परत में हुआ छिद्र भी काफी हद तक भर गया। इस तरह लाँकडाउन ने सम्पूर्ण पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी के लिए संजीवनी का काम किया है।

अपने व्याख्यान में डा० पाठक ने लाँकडाउन के दौरान व्यतीत किए जाने वाले दिनचर्या के बारे में भी बताया कि इस दौरान हम सादा जीवन व्यतीत करते हुए एवं घरों से बाहर न निकलकर न केवल प्राकृतिक पर्यावरण को, बल्कि सामाजिक पर्यावरण को भी काफी हद तक संतुलित रखे हैं। उन्होंने लाँकडाउन की जीवन शैली एवं दिनचर्या को भारतीय संस्कृति से जोड़ते हुए कहा कि यदि हम अपनी परम्परागत भारतीय संस्कृति में निहित जीवन शैली एवं दिनचर्या को पुनः अपनाकर जीवन व्यतीत करें तो शायद ऐसा जीवन न केवल हमारे प्राकृतिक पर्यावरण, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक पर्यावरण को भी संतुलित बनाए रखने में अहम् भूमिका निभायेगा। 

अंत में डा० पाठक ने कहाकि इस तरह के लाँकडाउन न केवल कोरोना काल में या महामारियों में, बल्कि समय- समय पर पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखने हेतु भी लागू किया जाना चाहिए। यही नहीं ऐसे लाँकडाउन को हमें स्वतः अपनी दिनचर्या मे शामिल कर लेना चाहिए, तभी पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को सुरक्षित तथा संतुलित रखकर न केवल अपने जीवन को, बल्कि भावी पीढ़ी के जीवन को और प्रकृति को भी सुरक्षित रखकर सृष्टि को विनष्ट होने से बचा सकेंगे.