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कोरोना काल के अंतिम चरण में होने वाला संक्रमण एवं बढ़ता प्रदूषण हो सकता है घातक : डाॅ० गणेश पाठक
October 3, 2020 • परिवर्तन चक्र • कोरोना वायरस

विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं देश - विदेश के वैज्ञानिक शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों द्वारा किए गये शोधों के आधार पर बार- बार चेतावनी दी जा रही है कि दिसम्बर, 2020 तक कोरोना विषाणु का संक्रमण और बढ़ सकता है और साथ ही साथ संक्रमण का दूसरा दौर भी प्रारम्भ हो सकता है, जिससे संक्रमण की स्थिति विस्फोटक हो सकती है। संक्रमण में वृद्धि का सबसे बड़ा कारण लोगों की लापरवाही बताया जा रहा है। जिसमें मास्क न पहनना एक सबसे बड़ा कारण है।

दूसरी तरफ वर्षा ऋतु की समाप्ति होने पर जमाव से उत्पन्न जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण एवं मिट्टी प्रदूषण भी बढ़ जाता है। जल जमाव से नालियां जाम होकर बजबजाने लगती हैं, कुड़ा- कचरा सड़ कर दुर्गंध देने लगता है। नमी युक्त वातावरण से अनूक तरह के विषैले कीड़ों एवं मच्छरों की उत्पत्ति होती है, जिससे मलेरिया एवं फाईलेरिया रोग सहित सर्दी, जुकाम, बुखार, फोड़े- फुंसी, दाद-खाज आदि संक्रमणजनित बबीमारियाँ फैलने लगती हैं। यही नहीं जाड़ा प्रारम्भ होते ही कुहरा का प्रकोप बढ़ जाता है और वायु प्रदूषण भी गंभीर रूप धारण कर लेता है। कुहरा के कारण दृश्यता कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में बरसात की समाप्ति से लेकर पूरे जाड़े भर संक्रमण की स्थिति घातक हो सकती है। इसी दौरान धान की पराली जलायी जाती है, जिससे वायु प्रदूषण में अत्यधिक वृद्धि होती है और दमघोटू वातावरण में साँस लेना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति मे एक तरफ कोरोना का संक्रमण एवं दूसरी तरफ वायु प्रदूषण का संक्रमण घातक स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

जहाँ तक बलिया जनपद सहित पूर्वांचल के जनपदों एवं इस क्षेत्र में स्थित शहरों की बात है तो उनमें भी संक्रमण की स्थिति भयावह हो सकती है। बलिया सहित पूर्वांचल के जिलों में कोरोना का संक्रमण और उनसे होने वाला मृत्यु धमने का नाम नहीं ले रहा है। सभी गतिविधियाँ चालू हो जाने से एवं जल तथा वायु प्रदूषण में अक्टूबर 2020 से लेकर जनवरी 2021 तक वायु प्रदूषण में भी वृद्धि होने से बलिया, गाजीपुर, मऊ, आजमगढ़, जौनपुर, वाराणसी, संत रविदास नगर, चंदौली, मिर्जापुर एवं सोनभद्र जिलों में स्थिति भयावह हो सकती है। जहां तक बलिया सहित पूर्वांच के जिलों में पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण की बात है तो इन जिलों में भी रोक के बावजूद भी धड़ल्ले से धान एवं गेहूँ दोनों की पराली जलायी जाती है, जिससे निकला धुँआ कार्बन के रूप में वायुमंडल में पहुँचकर वायु को प्रदूषित कर देता है। जनपद बलिया में विगत वर्षों में प्राप्त आँकड़ों के अनुसार 120231 हेक्टेयर कृषि भूमि पर धान की खेती की जाती है। यदि विकासखण्डवार स्थिति को देखें तो सीयर, नगरा,रसड़ा, चिलिकहर, नवानगर, पन्दह, मनियर, बेरूआरबारी, बाँसडीह, रेवती, गड़वार, सोहाँव, हनुमानगंज, दुबहड़, बेलहरी, बैरिया एवं मुरलीछपरा विकासखण्डों में क्रमशः 13162, 19518, 10751, 11604, 8361, 11577, 8669, 5024, 6129, 4381, 8605, 3299, 3282, 1460, 73, एवं 77 हेक्टेयर कृषि भूमि पर धान की खेती की जाती है। यदि इनमें से 50 प्रतिशत भी धान की खेती की पराली जलाई जाती है तो स्थिति भयंकर हो सकती है, जैसा कि विगत वर्षों में होता रहा है।

प्रश्न यह उठता है कि आखिर कोरोना के संक्रमण एवं धान की पराली से उत्पन्न वायुप्रदूषण की स्थिति से निपपा कैसे जाए? एक बात तो निश्चित है कि जब सारी गतिविधियाँ चालू हो गयी हैं तो अब लाँकडाउन भी नहीं लगाया जा सकता। उपाय सिर्फ एक है इससे बचाव करना, जिसमें सबसे अहम् है मास्क पहनना। किंतु हम किसी को मास्क जबरजस्ती नहीं पहना सकते । हाँ इस पर निगरानी एवं थोड़ी सख्ती अवश्य बनाए रखनी होगी। सबसे अहम् बात है मास्क पहनने के प्रति जन जागरूकता पैदा करना। ओर यह केवल सरकार या प्रशासन का काम नहीं है, बल्कि यह हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि जो लोग भी बिना मास्क के दिखाई दें, उनको अवश्य बतलाया जाय कि आपके मास्क न पहनने से सिर्फ आपको ही नुकसान नहीं होगा, बल्कि आपके साथ रहने वाले होगों को भी संक्रमण हो सकता है। यही नहीं यदि सम्भव हो तो अपने पास मास्क भी रखा जाय और जरूरतमंदों को उपलब्ध भी कराया जाय।

यहाँ तक पराली जलाने कै रोकने की बात है तो इसके लिए प्राविधान बनाया गया है कि परालीजलाने वालों पर दण्डात्मक कारवाई की जायेगी। अतः जो पराली जलाता है, उसे दण्डित किया जाय ताकि और लोगों में भी डर व्याप्त हो। साथ ही साथ इसके लिए भी जनजारूकता पैदा करना अति आवश्यक है। इससे होने वाले दुष्परिणामों से किसानों को अवगत कराया जाय और यह भी समझाया जाय कि पराली जलाने से न केवल उसी क्षेत्र में, बल्कि इसका व्यापक प्रभाव पड़ता है और इससे हजारों- लाखों लोगों का जीवन संकट में पड़ सकता है।

निश्चित तौर पर यदि कोरोना संक्रमण के प्रति सावधानी नहीं बरती गयी और पराली जलाने से उत्पन्न प्रदूषण सहित अन्य प्रदूषण धूलि कण से उत्पन्न प्रदूषण, सडा़स गंध आदि से उत्पन्न प्रदूषण को नहीं रोकाक्षगया तो स्थिति भयावह हो सकती है और फिर उस पर नियंत्रण पाना आसान नहीं होगा।