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कंगारू मदर केयर समय पूर्व जन्मे शिशुओं के लिए है संजीवनी
November 20, 2020 • परिवर्तन चक्र • स्वास्थ्य

ठंड में हाइपोथर्मिया से बच्चों को सुरक्षित रखने में बेहद कारगर

बलिया। नवजात को अधिक ठंडी के कारण स्वास्थ्य जटिलताएं बढ़ने की संभावना रहती है जिसे चिकित्सकीय भाषा में हाइपोथर्मिया कहा जाता है। सही समय पर हाइपोथर्मिया से बचाव के प्रबंध नहीं किए जाने पर नवजात की जान भी जा सकती है। हालांकि इस गंभीर समस्या का निदान आसानी से घर पर भी किया जा सकता है जिसके लिए ‘कंगारू मदर केयर’ (केएमसी) काफ़ी असरदार साबित हो सकता है।

‘कंगारू मदर केयर’ में माँ या घर का कोई भी सदस्य नवजात (बगैर कपड़ों के) को अपनी त्वचा से चिपकाकर नवजात को शरीर की गर्मी प्रदान करते हैं। इससे नवजात को हाइपोथर्मिया से उबरने में सहायता मिलती है। कम वजन के बच्चों के लिए आवश्यक - जिला महिला अस्पताल स्थित प्रसवोत्तर केंद्र में कार्यरत नवजात शिशु बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.सिद्धार्थ मणि दुबे ने बताया कि 2.5 किलोग्राम से कम वजन के बच्चों को कमजोर नवजात की श्रेणी में रखा जाता है जिन्हें सघन देखभाल की जरूरत होती है। कमजोर नवजातों के उचित देखभाल की कड़ी में ‘कंगारू मदर केयर’ काफ़ी असरदार प्रक्रिया होती है। इससे नवजात को हाइपोथर्मिया से बचाव के साथ नवजात के वजन में वृद्धि होती है। साथ ही इससे उनके बेहतर शारीरिक विकास में भी सहयोग मिलता है। जब बच्चा 2.5 किलो ग्राम का हो जाय या 37 हफ्ते के गर्भावधि के बाद केएमसी को बंद किया जा सकता है । 

‘कंगारू मदर केयर’ के दौरान इन बातों का रखें ध्यान

–‘कंगारू मदर केयर’ माँ के साथ घर का कोई भी सदस्य प्रदान कर सकता है। केयर प्रदान करने वाले व्यक्ति को केएमसी से पूर्व हर बार शरीर को साफ़ करना जरुरी है।

–नवजात के मुँह को छाती के मध्य बीच में लिटाएँ एवं यह सुनिश्चित करें कि उसका शरीर केएमसी देने वाले के छाती से चिपका हो।

–नवजात के शरीर पर टोपी, हाथों और पैरों में दस्ताने व पैरों में मोज़े व लंगोटी के अलावा शरीर पर कोई वस्त्र न हो।

–बच्चे का सिर इस प्रकार से ढँका जाए कि उसे सांस लेने में कठिनाई न हो।

–केएमसी देने वाला व्यक्ति ऊपर से मौसम के अनुसार कोई कपड़ा अवश्य ढँक लें।

केएमसी के फ़ायदे

–केएमसी देने से माँ की कन्हर (प्लेसेंटा) जल्दी बाहर आ जाता है।

–बच्चे को सीने से लगाने से माँ का दूध जल्दी उतरता है।

–नवजात शिशु स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है।

–शिशु का वजन बढ़ता है और शारीरिक विकास बेहतर हो जाता     है।

–माँ एवं बच्चे के बीच मानसिक एवं भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है।