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कभी पैसे के लिए थीं मोहताज, अब 22 हजार महिलाओं को दी हुई है नौकरी
September 2, 2020 • परिवर्तन चक्र • मनोरंजन

यह हैं रूमा देवी

रूमा देवी राजस्थान के बाड़मेर जिले की वासी हैं। राजस्थानी हस्तशिल्प जैसे साड़ी, बेडशीट, कुर्ता समेत अन्य कपड़े तैयार करने में इनका कोई मुकाबला नहीं । इनके बनाए गए कपड़ों के ब्रांड कईं देशों में भी लोकप्रिय हैं। रूमा देवी भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित बाड़मेर, जैलसमेर और बीकानेर जिले के करीब 75 गांवों की 22 हजार महिलाओं को रोजगार प्रदान कर रही हैं। इन सब औरतों के द्वारा तैयार की गई चीजों का लंदन, जर्मनी, सिंगापुर और कोलंबो के फैशन वीक्स में भी प्रदर्शन हो चुका है, जो कि बहुत ही गौरव की बात है ।

5 साल की उम्र में मां को खोया

अभी भले ही रूमा देवी हजारों महिलाओं का जीवन सुधार रही हों, लेकिन इन्होंने अपने जीवन की शुरुआत से ही दुख और संघर्ष झेला। बाड़मेर जिले के गांव रातवसर में खेताराम व इमरती देवी के घर नवम्बर 1988 में रूमा देवी जन्मी। पांच साल की उम्र में रूमा को अपनी मां को अलविदा कहना पड़ा। पिता ने उसके बाद दूसरी शादी कर ली। 7 बहन व एक भाई में रूमा देवी सबसे बड़ी हैं।

10 किमी दूर बैलगाड़ी पर करना होता था सफर, लाती थीं पानी

रूमा देवी अपने चाचा के पास रही और वहीं बड़ी हुईं । गांव के सरकारी स्कूल से सिर्फ आठवीं कक्षा तक पढ़ाई कर पाईं । राजस्थान में पीने के पानी की सबसे ज्यादा किल्लत बाड़मेर में है। यहां भूजल स्तर पाताल की राह पकड़ चुका है। ऐसे में रूमा वो कष्टदायक समय भी गुजरी जब इन्हें बैलगाड़ी से 10 किलोमीटर दूर का सफर तय कर ना पड़ता था।

रूमा की तकदीर में हुआ यह चमत्कार

बाड़मेर में 1998 में ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान बाड़मेर (जीवीसीएस) नाम से एनजीओ की रचना हुई , जिसका मकसद था राजस्थान के हस्तशिल्प उत्पादों के माध्यम से महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और उनकी पैसा कमाने में मदद करना। वर्ष 2008 में रूमा देवी भी इससे संस्थान का भाग बनीं और खूब मेहनत की। हस्तशिल्प उत्पादों के नए नए डिजाइन तैयार किए। बाजार में मांग उँची करवाई। वर्ष 2010 में इन्हें इस एनजीओ की कमान थमा ​दी गई। अध्यक्ष का पद इन्हें सौंप दिया गया। एनजीओ का मुख्य कार्यालय बाड़मेर में स्थित है।

क्या काम करता है रूमा देवी का एनजीओ?

ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान के सचिव विक्रम सिंह ने बताया कि उनके एनजीओ में आस-पास के तीन जिलों की करीब 22 हजार महिलाएं काम कर रहीं हैं। ये म​हिलाएं अपने घरों से ही हस्तशिल्प उत्पाद बनातीं हैं। बाजार की डिमांड के हिसाब से इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है और तैयार उत्पाद को बेचने में मदद एनजीओ करता है। सभी महिलाओं के कामकाज और मेहनत का सालाना टर्न ओवर करोड़ों में आता है।

पारिवारिक जीवन

17 साल की नाज़ुक उम्र में रूमा देवी की शादी हो गई थी। बाड़मेर जिले के ही गांव मंगल बेरी के निवासी टिकूराम के साथ उनका विवाह हो गया। इनके एक बेटा है लक्षित, जो अभी स्कूल जाता है। टिकूराम नशा मुक्ति संस्थान जोधपुर के साथ जुड़े हुए हैं। रूमा देवी ने बाड़मेर में मकान बनाए हुए हैं जबकि इनका बचपन गांव रावतसर की झोपड़ियों में बीता।

रूमा देवी कामयाबी और बहादुरी की है मिसाल

रूमा देवी से आप संघर्ष से कैसे लड़ा जाए, मेहनत और कामयाबी कैसे पाई जाए, यह सीख ले सकते हैं । इन्हें भारत में महिलाओं के लिए सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘नारी शक्ति पुरस्कार 2018’ से सम्मानित किया जा चुका है। 15 व 16 फरवरी 2020 को अमेरिका में हुई दो दिवसीय हावर्ड इंडिया कांफ्रेंस में रूमा देवी भी शामिल थीं। इन्हें वहां अपने हस्तशिल्प उत्पाद दिखाने का और हावर्ड यूनिवर्सिटी के बच्चों को पढ़ाने का अफसर भी मिला। इसके अलावा रूमा देवी ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में भी आ चुकी हैं।

सोशल मीडिया की एक्टिव यूज़र हैं

रूमा देवी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर काफी एक्टिव रहती हैं। इनके फेसबुक पेज को करीब 1 लाख 64 हजार लोगों ने लाइक करा हुआ है। ट्विटर पर इन्हें 6 हजार 500 लोग फॉलो करते हैं। सोशल मीडिया पर रूमा देवी अपने हस्तशिल्प उत्पादों के बारे में अक्सर खबरें देती रहती हैं।

झोपड़ी व यूरोप यात्रा वाली तस्वीरें

झोपड़ी और यूरोप की यात्रा वाली तस्वीरें खुद रूमा देवी ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर करी हैं। वर्ष 2016-2017 जर्मनी में दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड फेयर हुआ था, जिसमें शामिल होने की फीस करीब 15 लाख रुपए है, लेकिन रूमा देवी और उनकी टीम को वहां फीस लिए बिना ही बुलाया गया था। उस समय वहां बर्फ गिर रही थी। रूमा देवी ने अब 31 जुलाई 2020को अपनी जर्मनी यात्रा की तस्वीरें फेसबुक पेज पर डाली। शेयर करते हुए लिखा ‘यूरोप यात्रा डायरी से। गाड़ी के शीशे पर बर्फ वैसे ही जैसे थार में रेत जमा होती हैं’ । 28 जून को अपनी झोपड़ी वाली तस्वीर शेयर करते हुए रूमा देवी ने लिखा ‘दस साल पहले, हस्तशिल्प पर डॉक्यूमेंटरी शूटिंग की यादें’

रूमा देवी पर लिखी किताब ‘हौसले का हुनर’

रूमा देवी पर हाल ही किताब भी लिखी गई , जो ‘हौसले का हुनर’ नाम से जानी जाती है। निधि जैन द्वारा लिखी गई किताब ‘हौसले का हुनर’ में रूमा देवी के संघर्ष और उनकी सफलता की पूरी कहानी बताई गई है। किताब में बताया गया है कि रूमादेवी ने अल्पशिक्षा, संसाधनों की कमी, तकनीकी अभाव के बाद भी किस तरह से सफलता की सीढ़ी चढी और पर अपना नाम बनाया । खुद अपने छोटे से गांव से निकलकर विदेशों तक पहुंचीं और हजारों महिलाओं को अपने साथ आगे बढ़ाया।