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जिसका व्यक्तित्व सदा अपनी गरिमा में विहँसता रहा भारतीय लोकतंत्र के समर्थ हस्ताक्षर-सौदंर्य हस्ताक्षर श्री चन्द्रशेखर
July 9, 2020 • परिवर्तन चक्र



भारतवर्ष के राजनीतिक क्षितिज पर सर्वदा किसी न किसी रूप में छाये रहने वाला चर्चा का व्यक्ति, जिसका जीवन महात्मा गांधी, टालस्टाय, रस्किन, मार्टिनलूथर किंग, अब्राहम लिंकन तथा लेनिन जैसे दार्शनिको तथा समाजिक चिन्तको से प्रभावित रहा। तो वही पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्रदेव, डॉ0 राममनोहर लोहिया तथा संत विनोवा भावे जैसे क्रांतिकारी चिन्तकों तथा मानवीय चेतना में समाजवादी चिन्तन तथा राष्ट्रीय चरित्र के मूल्यों को प्रतिस्थापित कर संपूर्ण मानवता के सुख समृद्धि की मंगलमय कामना करने वाले उद्घोषकों का जिसे सान्निध्य मिला, जो स्वाभाव का अक्खड़, बेलाग लपटाव के निःशंक अपने मन की बात कह देने वाला, बातों की मस्ती में उन्मुक्त ठहाका लगाने वाला ‘एकला चलो’ में विश्वास रखने वाला जमीन का आदमी, जिसने जीवन में कभी इस बात की परवाह नही की कि किसने मेरा साथ छोड़ दिया परन्तु साथ चलने वालों में कौन उससे छूट गया इस बात की चिन्ता सदैव की। जो संबंधों के निर्वाह में  अद्वितीय रहा, जिसके पदचाप से सदा एक नई जागृति, नई चेतना, एक नये अभियान तथा राष्ट्र को नये संदेश की ध्वनि आती, जो मानव की भूख तथा राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति सदैव संवेदनशील रहा, जो राजनीतिक शतरंज की विसात पर अपनी चाल चलने में माहिर था। राजनीति और कूटनीति का चतुर खिलाड़ी अपने आदर्शो तथा सिद्धान्तों से कभी समझौता न कर पाने के कारण ही युवातुर्क से संबोधित तथा विख्यात, भारत का गौरव बलिया की पावन धरती इब्राहिमपट्टी की धवल यशकीर्ति लेखा, सदा अपनी गरिमा मंे विहंसता हुआ व्यक्तित्व की पहचान रखने वाला स्वाभिमान, निर्भीकता, साहस तथा संघर्षों का प्रतीक कीर्ति स्तम्भ, भारतीय लोकतंत्र के संक्रमणकालीन इतिहास का समर्थ्य हस्ताक्षर समर्थ पुरूष का नाम तो आप जान ही गये होंगे परन्तु अपनी कलम से उस यशस्वी युग पुरूष लोकतंत्र के सौंदर्य हस्ताक्षर का नाम लिखना मै अपना सौभाग्य मानूंगा तो लीजिए नाम है- श्री चन्द्रशेखर। 

सन् 1927 ई0 चैत्र पूर्णिमा 17 अप्रैल को इब्राहिमपट्टी गांव के ठाकुर सदानन्द सिंह को इस यशस्वी पुत्र के पिता होने का गौरव प्राप्त हुआ। साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपा गृहस्थ घर की गृहणी गरिमामयी सृजनदात्री जननी-मॉ द्रौपदी देवी ने इस सपूत को जन्म दिया। श्री चन्द्रशेखर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे तथा उनके पढ़ते समय ही प्रतिभाशाली होने की अनेक लक्षण उनमें दिखते थे। लम्बा बदन, श्यामल-गौर मिश्रित रंग, उचा भाल, लम्बी भुजाएं, कुर्त्ता-धोती, का लिबास पैरो में चप्पल, चलने की गति तेज, महापुरूषों के लक्षण हैं। आखों में गजब की ज्योति, शोभायमान हसता हुआ चेहरा, ऐसा व्यक्तित्व जो बरबस ही किसी के अन्तर्मन को छू ले अपनी ओर आकृष्ट कर ले। ऐसा आकर्षण बिरले ही लोगों के व्यक्तित्व में  देखने को मिलता है। 
 चन्द्रशेखर जी का व्यक्तित्व संघर्ष के क्षणों में  ही तपा और निखरा। उस व्यक्ति ने गांव और गरीबी का दर्द न केवल देखा था अपितु झेला भी था। जिनका नाम लेते ही हम बलियावासियों का मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता है, जिनके जीवन के परतों के एक-एक अक्षर जनसेवा तथा त्याग का दस्तावेज है, जिसमें मानव का सर्वोत्कृष्ट सौदर्य ‘मनुष्यत्व’ का दर्शन होता है। जिनकी जीवन यात्रा मानवीय संवेदनाओं से आविर्भूत सोच के तहत गतिमान रही, जिन्होंने अभिशप्त गरीबी के थपेड़ों से आहत गरीब की दर्द भरी आसूंओ की पीड़ा को पीया, अर्थाभाव में जीवन की समस्याओं से जूझते बेबस, लाचार, किसान-मजदूरों के मुर्झाये चेहरो के भीतर छिपी व्यथा और वेदना के मर्म को जाना। जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष करते हुए असहाय, रोगग्रस्त मरीजों के दर्द संताप और मजबूरी का अहसास किया, उनकी पथराई आखाें में  छिपी वेदना ने उनके जीवन को झकझोर दिया और इन दीनदुखियों को इस गरीबी के दलदल से कैसे निकाला जाय, उन्हे कैसे निजात दिलाई जाय, इसकी छटपटाहट, कसमसाहट तथा तड़प ने उन्हे लोकसेवा का पथिक बना दिया और लोकसेवा जिसका धर्म बन गया, राजनीति उसका बाना।

राजनीति का चस्का तो उन्हें प्रारंभिक जीवन में  ही लग गया था। समाजसेवा की अटूट लालसा सदैव मन में  बनी रही। प्रारम्भ में  उन्होंने समता के सपने की दिशा में  सोचना शुरू किया था और कम्यूनिस्ट आंदोलन से प्रभावित हुए थे परन्तु 1942 में  कम्यूनिस्टों के राष्ट्र विरोधी भूमिका तथा आपसी होड़ और वैमनस्य के कारण उधर से विमुख हो गये। उनहोंने अनुभव किया कि मानव, मानव के प्रति इतनी घृणा करे, अपने साथियों के साथ विश्वासघात करें, उनकी हत्या करे तो उस समाज या दर्शन मंे अवश्य कोई कमी है इसलिए यह साम्यवाद उनके काम का नहीं रहा। इसके बाद श्री चन्द्रशेखर समाजवादी लोगों के सम्पर्क में  आये जहां समतामूलक समाज के लिए प्रयास करने के साथ ही साथ मानव मूल्यों की रक्षा की भी बात थी, जहां मनुष्य को शोषण से मुक्ति दिलाने के साथ ही साथ उनके अधिकारों, मूल अधिकारों, विचार स्वातंत्रय को अक्षुण्ण रखने का दावा था, स्वाभाविक ही श्री चन्द्रशेखर इस आंदोलन के प्रति आकर्षित होते। यह उनका सौभाग्य था कि इन्हीं प्रारम्भिक दिनों में  वे आचार्य नरेन्द्र देव के सम्पर्क में  आये। आचार्य जी की गहन विद्वता उनके आदर्श विचारों मंे सर्वाग संपूर्णता उनके व्यक्तित्व का आकर्षण था। उन्हीं के आह्वान पर श्री चन्द्रशेखर ने अपने कैरियर की बलि दे दी और सोशलिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक सदस्य बन गये। बाद में  सोशलिस्ट पार्टी का जब किसान-मजदूर प्रजा पार्टी में  विलय हुआ तो इस प्रकार एक नई पार्टी ‘‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’’ का जन्म हुआ। तो श्री चन्द्रशेखर इस पार्टी के अपने आप सदस्य बन गये। 1955 में  डा0 राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में  प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से विद्रोह कर कुछ लोगों ने पुनः सोशलिस्ट पार्टी बना ली परन्तु वैचारिक मतभेद के कारण श्री चन्द्रशेखर जी, अशोक मेहता, गंगाचरण सिंह आदि के साथ प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में  ही बने रहें। अपनी लगन, परिश्रम तथा ध्येयनिष्ठा के बल पर प्रांतीय पार्टी में मंत्री बन गये। उस वक्त उनकी उम्र 30 वर्ष थी। उसी वर्ष 1957 में  अपनी पार्टी के टिकट पर बलिया से लोकसभा का चुनाव लड़े परन्तु चुनाव जीत न सके। सन् 1962 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की ओर से उन्हे राज्यसभा की सदस्यता मिली जो इतने कम उम्र के लोगों को नहीं मिल पाती क्योंकि यह तो बड़े-बुढे़ अनुभवी राजनीतिज्ञों और विचारकों की सभा होती है। इंग्लैण्ड में तो इसे हाउस आफ लार्डस कहते ही है। राज्यसभा की सदस्यता के बाद वे सदैव बलिया से लोकसभा के सदस्य रहे। एक बार 1984 में इंदिरा गांधी के सहानुभूति की लहर में चुनाव न जीत सके परन्तु इसके बाद आजीवन बलिया लोकसभा का प्रतिनिधित्व किये। इस वक्त उनके दूसरे छोटे पुत्र श्री नीरज शेखर लोकसभा बलिया का प्रतिनिधित्व कर रहे है तथा प्रौत्र श्री रविशंकर सिंह ‘पप्पू जी’ उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य है। 

गौरव भरी उपलब्धिः-कालान्तर में भारतीय लोकतंत्र का सजग पहरूआ, संघर्षो से संघर्ष कर अपनी मंजिल हासिल करने वाले ‘‘वीर भोग्या बसुन्धरा’’ के उद्घोषक ने सफलताओं के उतुंग शिखर पर बैठ 16 नवम्बर 1990 को भारतीय लोकतंत्र का सर्वोत्कृष्ट अत्यन्त महत्वपूर्ण सम्मानित तथा गरिमामय प्रधानमंत्री का पद प्राप्त कर बलिया के गौरव को विश्व पटल पर स्थापित कर मस्तक ऊँचा किया। यह उनके जीवन की एक गौरव भरी उपलब्धि थी। उस समय पूरा राष्ट्र संक्रमण से गुजर रहा था। उन्होंने अपने बुद्धि, विवेक, सियासी, अनुभव तथा कूटनीति की कौशल के बल पर राष्ट्र को सही रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया। इनका आचरण सदा पद की गरिमा के अनुरूप रहा।

असाधारण मेधा तथा प्रतिभा के धनीः-चन्द्रशेखर जी की प्रखर प्रतिभा उच्चकोटि की मेधा तथा विद्वतापूर्ण व्यक्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग ही नही सकता। विद्वता ही उनके व्यक्तित्व का आभूषण तथा पहचान थी, राजनेता उसके बाद थे। इसका ज्वलन्त प्रमाण उनकी ‘‘मेरी जेल डायरी’’ है। इस पुस्तक की सर्वोत्कृष्टता, शोभा, सौदर्य का प्रमाण यह है कि यदि आप अकेले में भी इस पुस्तक को पढ़े तो आपके मुह से बरबस ही निकल पड़ेगा वाह रे! चन्द्रशेखर जी इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने प्राकृतिक सौदर्य तथा मानव जीवन के हर पहलू को उजागर किया है। उस वक्त पूरे विश्व में  विभिन्न राष्ट्रों में जहां राजनीतिक उथल-पुथल चल रहे थे उसकी तथा अन्य घटनाक्रमाें की इसमें  विस्तृत चर्चा की गयी है। साहित्य की उचाई इतनी अधिक है कि मनमुग्ध हो जाता है। इस कालजयी रचना के रचनाकार पर आदमी रीझ जाता है। कहीं-कही तो लगता है जैसे कालिदास भी फीके पड़ गये। साहित्य के अलंकरणों से अलंकृत, चिन्तन के रस में  सराबोर, इस पुस्तक ‘‘मेरी जेल डायरी’’ के सौदर्य का जितना भी बखान किया जाय कम ही है। जेल के सिकचों के भीतर लिखी गयी यह अनुपम पुस्तक 721 पेज की है। आप इसे अवश्य पढ़े। ‘‘यंग इण्डिया’’ पत्रिका का उन्होंने सदैव संपादन किया। संसद मंे छाये रहे, अनर्गल तथा हल्की बाते संसद में कभी नही की बल्कि सार्थक, सकारात्मक सोच तथा राष्ट्रहित की चिन्तनपूर्ण बातें कहीं, इसीलिए जब वे संसद में बोलने के लिए खड़े हो जाते थे तो पूरी संसद शांत हो जाती थी और न केवल सांसद वरन पूरा विश्व उनकी बातों को सुनने के लिए लालायित रहता था, मानों सुनने के लिए कुदरत भी ठहर गयी हो, इसीलिए उन्हें ‘‘सर्वश्रेष्ठ सांसद’’ के अलंकरण से अलंकृत किया गया जो उनकी प्रतिभा तथा वक्तृत्व शक्ति का गरिमामय प्रमाण है। 

उम्र बढ़ती गई, सौंदर्य निखरता गयाः-यह अद्भुत विरोधाभास कुछ विलक्षण व्यक्तित्व के लोगों में ही देखने को मिलता है। सामान्यतया उम्र बढ़ती है तो मुख्य रूप से आदमी का शारीरिक सौंदर्य घटने लगता है। परन्तु इसके विपरीत कुछ लोगों की उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनका सौंदर्य निखरता जाता है। श्री चन्द्रशेखर की जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई उनका आन्तरिक और वाह्य सौंदर्य दोनों ही निखरता गया। यह कुदरत की मेहरबानी ही कही जायेगी। स्वामी खपड़िया बाबा महराज, रवीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी की जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई उनके सौदर्य में निखार आता गया। 
 जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व नील नभ की उचाई को छूता हो तथा नील निधि की गहराई को भी पराजित करता हो, उस व्यक्तित्व के उपर कुछ कहना दुस्साहस ही कहा जायेगा परन्तु जिस महान पुरूष का मुझे स्नेह मिला, आशीर्वाद तथा सान्निध्य मिला उसके संबंध में कुछ कह लेने के लोभ का संवरण न कर सका। दो चार शब्द किसी अज्ञात शक्ति के वशीभूत लिख गये। लिखा एक अक्षर भी नहीं। 

श्री चन्द्रशेखर के कुछ कथनः-‘‘कारा की दीवारे, मानव चेतना को कभी बन्दिनी नही बना सकती’’ .... मेरी जल डायरी। 
‘‘यदि महलों में चकाचौंध भरी रोशनी है, तो झोपड़ियों में भी दीये टिमटिमाते रहें, कभी बुझने न पायें अन्यथा अनर्थ हो जायेगा और इन महलों की भी रोशनी बुझ जायेगी’’ ... एक भाषण के दौरान। 

‘‘मैं किसी रास्ते पर इसलिए नही चलता कि कोई मेरे साथ चल रहा है बल्कि मुझे अपनी मंजिल का पता है। ‘मेरे कदम के साथ है, मंजिल लगी हुई। मेरी मंजिल जहां नही, मेरे कदम वहां नही’’ प्रधानमंत्री के रूप में लोकसभा में। 

‘‘बलिया के बाटी-चोखा खइला में जवन आनन्द आ तृप्ति मिलेला, उ दुनिया के कवनो व्यज्जन में ना मिलेला’’ .... साथियों के साथ बातचीत में। 

भोजपुरी से उन्हे ऐसा ही लगाव था जैसे मॉ का बेटे से। वे प्रायः भोजपुरी ही बोलते थे। अपनी जन्मभूमि तथा राष्ट्र सा प्यारा कुछ भी नहीं है। बातों बात में। 

कुछ ऐसी विभूतियां होती है जिन्हे न तो भुलाया जा सकता है, न बिसराया ही जा सकता है। न तो कालचक्र का प्रवाह उनकी यादों को धूमिल ही कर सकता है। अपनी यशकीर्ति के माध्यम से वे स्मृतिपटल पर सदा छाये रहते हैं। ऐसी ही शख्सिंयत थे-श्री चन्द्रशेखर जी। अपनी प्रतिभा और सेवा के बल पर जनमानस के अन्त स्थल में सम्मान के साथ बैठे रहे। चिर कर्मण्य बने रहने पर कीर्ति बरण करती है और जिसकी कीर्ति है वास्तव मंे वही जीवित है, वही वरेण्य है। श्री चन्द्रशेखर जी जीवन पर्यन्त कुछ न कुछ करते ही रहे। इस राष्ट्र को, मानव समाज को कुछ न कुछ देेते ही रहे। आज उनकी कृतियां उनके यशकीर्ति की गाथा मस्तक ऊँचा उठाकर गा रही हैं। उनका कीर्ति पताका विश्व स्तर पर फहरा रहा है। उनके ज्योतित प्रकाश पुज्ज कीर्ति स्तम्भ के आलोक में सारा भारतवर्ष नहा रहा है। उनका अरमान था कोई पेट भूखा न रहे, कोई पीठ उधार न रहे। कोई सर छप्परविहीन न रहे तथा कोई इलाज के अभाव में मर न जाये। अपनी प्रतिभा के अनुकूल सभी बच्चे अच्छी तालीम पा सकें। सबके जीवन के आंगन में खुशियों के दीये सदा जलते रहे। उनके अरमानों का यह मशाल कभी बुझने न पाये सदा जलता रहे, इसका प्रयास हम सबको करना चाहिए। 

काल के क्रूर हाथों ने असमय हमसे उन्हें छीन लिया। बलिया बेसहारा हो गया, लोकसभा सदा उनकी रिक्तता महसूस करती है। राष्ट्र के उस पुजारी, सजग पहरूआ, लोकतंत्र के समर्थ तथा सौंदर्य हस्ताक्षर, मनस्वी, मुग्धकारी यशस्वी व्यक्तित्व की स्मृतियों को शत् शत् नमन, शत् शत् प्रणाम। 
खो कर भी न गया इंतजार तेरा
दिल के दरवाजों पर तेरी दस्तके रह जायेंगी ...


राणा प्रताप सिंह

पूर्व प्रधानाचार्य

ग्रामः सोनबरसा (द्वाबा), बलिया