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जीवित्पुत्रिका व्रत
September 12, 2020 • परिवर्तन चक्र • अध्यात्म

रसड़ा (बलिया)। अपने संतान की लंबी आयु और उसके मृत्यु दोष को हरने के जिस पर्व को माताएं करती हैं, उसे जीवित्पुत्रिका व्रत कहा जाता है. जीवित्पुत्रिका व्रत के बारे में मिली जानकारी देते हुए कि अश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन जो व्रती स्त्रियां सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा अपनी संतान की आयु, आरोग्य तथा उनके कल्याण हेतु पूरे विधि-विधान से यह पावन पवित्र व्रत किया जाता है. लेकिन यह व्रत संतान यानी पुत्र और पुत्री दोनों के लिए किया जाता है.

संतान के स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु होने की कामना के लिए माताएं जीवित्पुत्रिका व्रत करती हैं. मुख्य रूप से इस व्रत को वही स्त्रियां रखती हैं, जिन्हें संतान होते हैं. पुराणों में कहा गया है कि इस व्रत को रखने वाली स्त्रियों को कभी संतान शोक से संतप्त नहीं होना पड़ता. साथ ही यह मृतवत्सा, बच्चों को मरण, दोष को भी दूर करता है. यह संतान के चतुर्विद विकास के लिए किया जाता है. इस दिन माताएं आपार श्रद्धा से इस व्रत को करती हैं. सबसे पहले स्नान करके भगवान नारायण का ध्यान करते हुए अपने संतान की दीर्घ आयु का संकल्प लेती हैं. पूरे दिन निर्जला रहकर शाम के समय सूत से बनी हुई जिवुतिया धारण करके जीमूतवाहन और शंखचूर्ण वाली व्रत सुनती हैं.

प्रतिवर्ष पितृ-पक्ष के दौरान परिवार में बच्चों के कल्याण के लिए अनुष्ठान कराया जाता है. माताएं सरसों तेल एवं खल्ली अपनें परिवार की महिला पूर्वजों और भगवान जीमूतवाहन को चढ़ा कर प्रार्थना करती हैं. इस दिन माताओं के द्वारा चील एवं सियारिन को चूड़ियां चढ़ाई जाती तथा दही खिलायी जाती है. सूर्योदय होने के बाद उनका निर्जला व्रत प्रारंभ हो जाता है. धर्मशास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि व्रत के दौरान रात्रि जागरण, चिंतन, मनन और षोड्शोपचार विधि से भक्ति भाव के साथ किया गया पूजन सफल होता है. जो महिलाएं प्रदोष काल में जीमूतवाहन की पूजा करती है और पूरा भक्ति भाव रखती है, इससे उनके पुत्र को लम्बी उम्र, व सभी सुखो की प्राप्ति होती है, इस व्रत को स्त्रियां करती है प्रदोष काल में व्रती जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा की धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित करती है, और उससे पूजा-अर्चना करती है,
 पूजा के समय व्रत महत्व की कथा का श्रवण किया जाता है. महिलाएं गले में लाल-पीले रंग के कच्चे धागों में गुंथी प्रत्येक पुत्र के नाम से बनी सोने व चांदी की प्रतीक चिह्न जिउतिया को धारण करती हैं.

लल्लन बागी द्वारा-