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जानिए तीन पत्तों वाले बेलपत्र शिवजी को चढाने से क्या फायदा होता है  
July 29, 2020 • परिवर्तन चक्र

भोले शंकर की पूजा में सभी सामग्रियों से बढ़कर बेलपत्र को माना जाता है। भोलेनाथ सिर्फ बेलपत्र में ही खुश हो जाते हैं। अगर आपके पास बाकी  सामग्री है लेकिन बेलपत्र नहीं है तो पूजा अधूरी मानी जाएगी । बेलपत्र का होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। तीन पत्तों वाला बेलपत्र शिवजी को बहुत प्रिय है। आइए जानते हैं वह इतना महत्वपूर्ण क्यों है।

समुद्र मंथन के  दौरान जब शिव जी ने विश पिया था, तब उनकी गले की जलन को बेलपत्र ने ही दूर किया था। शिवजी को बेलपत्र चढ़ाया गया था, ताकि विश का असर कम हो सके। तभी से  शिवजी को बेलपत्र चड़ाने की प्रथा शुरू हो गई । एक कथा यह भी कहती है कि बेलपत्र के तीन पत्ते शिवजी की तीसरी आँख दर्शाते हैं । यानी दोनों शिवजी और बेलपत्र एक ही हैं, इसलिए बेलपत्र को बेहद पवित्र माना जाता है।

बेलपत्र का महत्व शिव पूजा में सबसे ज्यादा है। शिवजी एक बेलपत्र से ही प्रसन्न हो सकते हैं इसलिए उन्हें ‘आशुतोष’ भी कहा जाता है।  बेलपत्र की तीन पत्तियां ब्रह्मा विष्णु और महेश का प्रतीक  मानी जाती हैं।  शिव पुराण में कहा गया है कि बेलपत्र भगवान शिव का ही रूप है। भगवान शिव स्वयं इसकी महानता को पहचानते  और स्वीकारते हैं। बेल वृक्ष की जड़ के पास शिवलिंग रखकर भोले की पूजा करना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा करने वाला व्यक्ति हमेशा खुश रहता है और शिव जी उसके सारे दुख हर लेते हैं।

बेल वृक्ष कैसे उत्पन्न हुआ वह स्कंद पुराण में बताया गया है। कहते हैं देवी पार्वती ने अपने ललाट से जो पसीना पोंछ कर फेंका उस की बूंदें मंदार पर्वत पर गिरी थी । बेल वृक्ष उन बूंदों से उगे। कहते हैं कि उनकी वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तनों में महेश्वरी, शाखाओं में  दक्षयायणी, पत्तियों में मां पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी मां वास करती हैं। और तो और बेल वृक्ष के कांटों में भी शक्तियां हैं। पूजा में बेलपत्र अर्पित करने से दोनों पार्वती मां और भोलेनाथ का आशीर्वाद मिलता है।

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम्। त्रिजन्मपापसं बिल्वपत्रं शिवार्पणम्॥’ इस मंत्र का जाप आपको बेलपत्र चढ़ाते हुए करना चाहिए। इस मंत्र का अर्थ होता है क‍ि तीन गुण, तीन नेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले और तीन जन्मों के पाप को संहार करने वाले हे शिवजी आपको त्रिदल बेलपत्र अर्पित करता हूं।

बेलपत्र तोड़ते हुए भगवान शिव की अराधना और ध्यान करना बहुत जरूरी है। चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति काल जैसे दिनों पर बेलपत्र कभी ना तोड़े। कभी भी बेलपत्र को टहनी से ना तोड़े। चढ़ाते समय बेलपत्र की डंठल को जरूर  तोड़े।