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गंगा के जलीय पारिस्थिति की तंत्र को संतुलित रखती है डाल्फिन : डाॅ० गणेश पाठक
October 11, 2020 • परिवर्तन चक्र


         
अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा के पूर्व प्राचार्य एवं समग्र विकास शोध संस्थान के सचिव पर्यावरणविद् डाॅ० गणेश पाठक एक विशेष भेंटवार्ता में  परिवर्तन चक्र को बताया कि हम मानव भले ही जीवनदायिनी, मोक्षप्रदायिनी, सर्वबाधाहरिणी माँ गंगा के जल को प्रदूषित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़े हैं, किंतु गंगा में निवास करने वाली एकमात्र स्तनधारी जलीय जीव डाल्फिन अभी भी गंगा जल के पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित बनाए रखने में अहम् भूमिका निभा रही हैं। अभी 2-4 अक्टूबर तक आयोजित जनजागरूकता गंगा यात्रा के प्रमुख सहभागी के रूपमें अपनी भूमिका निभाने वाले डाॅ० गणेश पाठक ने बताया कि गंगा यात्रा के दौरान बलिया परिक्षेत्र में 50 से अधिक डाल्फिन दिखाई दीं जो न केवल बलिया के लिए, बल्कि पूरे गंगा घाटी क्षेत्र के लिए एक शुभ संकेत है, जो गंगा जल के पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलित होने का प्रमाण है। कारण कि डाल्फिन स्वच्छ जल में ही रह सकती है और अपनी प्रजनन क्रिया कर सकती है।

सामाजिक प्राणी की तरह जीवन निर्वाह करती है डाल्फिन -

डाॅ० पाठक ने बताया कि डाल्फिन, जिसे हम सोंस या सूंस भी कहते है, की सम्पूर्ण जीवन चर्या एक सामाजिक प्राणी की तरह होती है। ये मानव की तरह ही एक बार में एक बच्चे को जन्म देती हैं एवं इनका गर्भधारण काल भी 10 महीने का होता है। गर्भवती डाल्फिन की देख- भाल हेतु 5-6 मादा डाल्फिनें उसके आस- पास उनकी सहायता के लिए रहती हैं और प्रसव के दौरान खासतौर से घेरे रहती हैं और बच्चे को स्वच्छ वायु में सांस लेने हेतु ये डाल्फिनें उसे जल सतह पर लाती हैं। माँ अपने बच्चे को बड़े ही लाड़-प्यार से पालन-पोषण करती है और एक वर्ष तक स्तनपान भी कराती है। इनके बच्चे प्रायः एक समूह में चलते हैं और अपने माँ के इर्द-गिर्द ही रहते हैं। माँ की विशेष सीटी की आवाज सुनकर ये अपने माँ के पास चले आते हैं। ये अपने पूरे परिवार के साथ रहते हैं, जिनकी संख्या 10-12 तक होती है और ये एक दूसरे की मदद करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। अपनी सांकेतिक भाषा बोलकर ये एक दूसरे से संचार कायम रखते हैं।

जल में रहते हुए भी स्तनधारी है डाल्फिन- 

डाॅ० पाठक ने बताया कि  डाल्फिन एक ऐसी स्तनधारी जलीय जीव है जो जल में रहते हुए भी मछली की श्रेणी में नहीं आती हैं। पूरे विश्व म़े इनकी लगभग 40 प्रजातियाँ पायी जाती हैं, जिनमें से मीठे जल वाली प्रजातियों की संख्या मात्र 4 है। इनमें से भी भारत की नदियों में रहने वाली डाल्फिनें मुख्यतः दो प्रकार की पायी जाती हैं, जिनका रंग प्राया काला या भूरा होता है। अपने देश में प्रायः गंगा एवं ब्रह्मपूत्र सहित इनकी सहायक नदियों में गंगेटिक डाल्फिनें मिलती हैं । किन्तु पाकिस्तान की सिंधु नदी, चीन की यागत्जी नदी (अब समाप्त प्राय) एवं दक्षिणी अमेरिका की अमेजन नदी में मिलने वाली डाल्फिनें गंगेटिक डाल्फिनों से भिन्न होती हैं। गंगा में मिलने वाली डाल्फिन को 'सोंस' या 'सूंस' भी कहा जाता है। यह नामकरण इनके द्वारा सांस लेने एवं छोड़ने की प्रक्रिया में निकलने वाली एक विशेष प्रकार की ध्वनि के आधार पर रखा गया है।

खुशमिजाज एवं मनमौजी प्रकृति की होती हैं डाल्फिनें -

डाॅ० पाठक के अनुसार डाल्फिनें एक खुशमिजाज एवं मनमौजी रूप से मस्त रहने वाले जीव हैं। वर्षा की रिमझिम फूहारो, बादलों की चमक एवं गर्जना तथा सुहावने मौसम में ये खूब अठखेलियाँ करती हैं एवं जल में उछलते हुए दिखाई देती हैं. यही कारण है कि गंगा यात्रा के दौरान मौसम सुहाना होने एवं वर्षा की फुहार के कारण ये अठखेलियाँ करते हुए बलिया में पर्याप्त मात्रा में दिखाई दीं। मानव की ये मित्र मानी जाती हैं और यही कारण है कि मानव के साथ इनका विशेष लगाव होता है यह अभी भी विशेष शोध का विषय बना हुआ है।

काफी पुराना है डाल्फिनों का धरती पर आगमन -

वैसे कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि डाल्फिनें धरती पर 10 करोड़ वर्ष पूर्व की आयी हुई है, किंतु अधिकांश वैज्ञानिकों का मत है इनकी उत्पत्ति लगभग दो करोड़ वर्ष पूर्व हुई और अन्य स्तनधारियों की तरह ये भीं लाखों वर्ष पूर्व जल से जमीन पर अपनी दुनिया बसाने की कोशिश की थीं, किंतु शायद धरती के पर्यावरण से ये अपने को समायोजित एवं अनुकूलित नहीं कर पायीं और पुनः जल में वापस जाकर जल की पारिस्थिति की तंत्र में ही ये अपना वास स्थान अनूकुलित कर लीं और तब से अद्यतन ये जल के पारिस्थिति की तंत्र से अपना अनुकूलन बनाए रखते हुए जल के पारिस्थिति की तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

 गंगा में डाल्फिनों का वास एवं प्रवास - 

गंगा नदी में निवास करने वाली डाल्फिनें विश्व की चार मीठे जल वाली डाल्फिन प्रजातियों में से एक खास डाल्फिन हैं। अपने देश में डाल्फिनों की संख्या लगभग 3000 है, जिसमें से लगभग 50 प्रतिशत विहार में हैं। गंगा की डाल्फिनें एक ऐसे क्षेत्र में रहती हैं, जहां नदी का प्रवाह बहुत कम होता है या नहीं के बराबर होता है। ऐसे क्षेत्रों में उन्हें अपनी ऊर्जा बचाने में सहायता मिलती है। किंतु खतरा का अहसास होने पर ये गहरे जल में भी गोता लगा लेती हैं। डाल्फिन मांसाहारी प्रजाति की जीव हैं जो मछलियों का शिकार कर अपना भोजन बनाती हैं। मछलियों का शिकार करने हेतु ये नदी के किनारे तक भी चली जाती हैं। ये मछली प्रधान क्षेत्रों में विशेष तौर से चहलकदमी करती रहती हैं ताकि इनको खाने हेतु पर्याप्त मछलियाँ मिल सकें।

 शारीरिक ढाँचा एवं क्रिया-प्रक्रिया -

गंगा नदी में मिलने वाली डाल्फिन की लम्बाई  5 से 18 फुट तक होती है एवं इनका भार 400 किग्रा तक होता है। यह प्रति ध्वनि का निर्धारण कर लेती हैं एवं इनमें सूँघने की अपार शक्ति होती है। मादा डाल्फिन की लम्बाई  नर से अधिक होती है। इनकी औसत आयु 28 वर्ष तक होती है। ये केवल शुद्ध एवं मीठे जल में ही जीवित रह सकती हैं। यें लम्बे नोकदार मुँह वाली होती हैं। दोनों जबड़े में दाँत होते हैं। इनकी आँखें लेंस रहित होती हैं, इस लिए प्रकाश की दिशा का पता लगाने हेतु साधन के रूपमें काम करती हैं। ये सबस्ट्रेट की दिशा में एक पंख के  सहारे तैरती हैं। इनका शरीर मोटी त्वचा से युक्त होता है। जुलाई, 2018 में किए गये सर्वेक्षण के अनुसार गंगा में इनकी संख्या 1150 पायी गयी है। इनके शरीर पर बाल नहीं होते हैं। फलतः ये शरीर का तापमान स्थिर रखने में असमर्थ होने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर प्रवास करती रहती हैं।

इनकी तैरने की गति 3 से 65 किमी० प्रति घंटे होती है। किंतु क्रोध  आने पर ये 90 किमी० घंटे की रफ्तार से तैरती हुई बिना रूके 113 किमी० तक चली जाती हैं। ये जल में 300 मीटर गहराई तक गोता लगा सकती हैं। गोता लगाते समय इनकी हृदय की गति आधी हो जाती है। यह प्राकृतिक रूप से इसलिए होता है कि इन्हें आक्सीजन की आवश्यकता कम पड़े और यह अधिक गहराई तक गोता लगा सकें।

क्यों समाप्त हो रही हैं डाल्फिनें -

डाल्फिनें प्रायः प्रदूषण रहित शुद्ध जल में ही रह पाती हैं। प्रदूषित जल में इनके जीवित रहने की दशाएँ विपरीत हो जाती है जिससे इनकी जीवन लीला समाप्त होने लगती है और इनकी प्रजनन क्षमता भी समाप्त हो जाती है। यही कारण है कि गंगा नदी में प्रदूषण बढ़ने से इनकी संख्या कम होती गयी। किंतु कोरोना काल में लाँकडाउन के चलते सारी मानवीय गतिविधियाँ बंद हो जाने से प्रदूषण कम हो गया तो इस दौरान इनकी संख्या एवं प्रजनन क्षमता में भी वृद्धि हुई है। अवैध शिकार होना, नदी में जल प्रवाह का कम होना, नदी तल का उथला होना, बाँधों एवं बैराजों का निर्माण आदि इनकी समाप्ति का मुख्य कारण है, जिस पर रोक लगनी चाहिए।

संरक्षण हेतु प्रयास- 

गंगा नदी में डाल्फिनों के संरक्षण हेतु अनेक प्रयास जारी है। 5 अक्टूबर, 2009 को डाल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव की घोषणा भारत सरकार द्वारा करके इनके संरक्षण में एक बहुत बड़ा प्रयास किया गया। गंगा की डाल्फिन को गुवाहाटी नगर प्रशासन द्वारा अधिकारिक रूप से नगर का शुभंकर घोषित किया गया है। भागलपुर, बिहार में डाल्फिन अभ्यारण्य की स्थापना की गयी है। प्रत्येक तरह से भौतिक रूप से एवं जनजागरूकता करके गंगा नदी को प्रदूषणमुक्त करने का प्रयास कितया जा रहा है। वर्ल्ड वाइल्ड लाईफ फंड द्वारा उत्तर प्रदेश में डाल्फिनों के संरक्षण एवं आवास में पुनः उन्हें प्रतिस्थापन करने का कार्यक्रम चलाया जा रहा है।