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धरा को हरा-भरा करके ही रोका जा सकता है सृष्टि के विनाश को : डाॅ० गणेश पाठक 
July 5, 2020 • परिवर्तन चक्र

वन महोत्सव सप्ताह 1-7 जुलाई पर विशेष :

बलिया। अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य एवं समग्र विकास तथा शोध संस्थान के सचिव पर्यावरणविद् डाॅ० गणेश कुमार पाठक ने एक से सात जुलाई तक चलाए जा रहे वन महोत्सव के संदर्भ में एक भेंटवार्ता में बताया कि मानव द्वारा विकास के क्रम में एवं भोगवादी प्रवृत्ति तथा विलासितापूर्ण जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वनों का इतना अधिक अतिशय दोहन एवं शोषण किया जाता रहा है कि उसके चलते अधिकांश वन संसाधन समाप्ति के कगार पर पहुँच चुके हैं एवं कुछ तो सदैव के लिए समाप्त हो गये हैं। वनवृक्षों की समाप्ति से अनेक तरह की पादप प्रजातियाँ एवं जंगलों में निवास करने वाले जीव-जंतुओं की अनेक प्रजातियाँ समाप्त हो गयी हैं एवं अधिकांश समाप्ति के कगार पर हैं।इस तरह सम्पूर्ण जैव विविधता ही नष्ट होती जा रही है।

एक तरफ जहाँ प्राकृतिक संसाधनों के समाप्त होने से पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ अनेक तरह की प्राकृतिक आपदाएँ हमारा अस्तित्व मिटाने पर तुली हुई हैं। औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, कृषि क्षेत्र के विस्तार, विभिन्न परियोजनाओं एवं मानव आवास मानव आवास हेतु जंलों का बेतहाशा गति से सफाया किया गया, जिसके चलते निरन्तर पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न होता गया। फलतः ग्लोबल वार्मिंग में तेजी से वृद्धि हो रही है और जलवायु परिवर्तन हो रहा है। जलवायु परिवर्तन से तापमान में तेजी से वृद्धि हो रही है, जिसके चलते मृदाक्षरण, भूस्खलन, सूखा, चक्रवात, अति वृष्टि एवं अनावृष्टि जैसी घटनाओं में वृद्धि हो रही है। इस तरह प्राकृतिक आपदाएँ हमारा विनाश करने को तत्पर हैं।जलवायु परिवर्तन के कारण जीवधारियों एवं वनस्पतियों के लिए भी खतरा बढ़ता जा रहा है। पादप एवं जीव जातियाँ समाप्त होती जा रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग से फसल चक्र भी प्रभावित हो रहा है एवं कृषि उत्पादकता कम होने से उत्पादनघटत जा रह है, जिससे भविष्य में खाद्यान्न संकट की भी समस्या उत्पन्न हो सकती है।

प्राकृतिक वनारण की दृष्टि से बलिया सहित पूर्वांचल का क्षेत्र है बेहद असंतुलित-

यदि हम क्षेत्रीय स्तर पर बलिया सहित पूर्वांचल के जिलों में पर्यावरण की स्थिति का अवलोकन करें तो स्थिति बेहत असंतुलित दिखाई देती है। वैसे भी पूर्वांचल में प्राकृतिक वनस्पतियों की बेहद कमी है।  पूर्वांचल के यदि सोनभद्र, मिर्जापुर एवं चंदौली जिलों को छोड़ दिया जाय तो शेष सात जिलों-आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी एवं संतरविदासनगर में यहाँ की कुल भूमि के क्रमशः 0.03, 0.33, 0.01, 0.02, 0.04,  0.00, 0.16, प्रतिशत भूमि पर ही वन क्षेत्र हैं, जबि पारिस्थितिकी संतुलन हेतु कुल भूमि के 33 प्रतिशत भूमि पर वन क्षेत्र आवश्यक होता है। इस तरह पूर्वांचल में स्थिति बड़ी ही विकट है। जिसके चलते इस क्षेत्र में पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी असंतुलन बढ़ता जा रहा है, जो भविष्य के लिए बेहद खतरे की घंटी है।

अब प्रश्न यह है कि इस क्षेत्र की पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी को असंतुलित होने से आखिर कैसे बचाया जाय? इस संदर्भ में इतना तो निश्चित कहा जा सकता है कि इसका एक मात्र उपाय वनावरण को बढ़ाना है। वन ही एक ऐसा पर्यावरण का अयवय है कि अगर वह संतुलित रहे तो उसके सहारे अधिकांश तत्व अपना विकास पर पुष्पित- पल्वित होते रहते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र संतुलित बना रहता है। किन्तु बलिया सहित पूर्वांचल के 7 जिलों आजमगढ़, मऊ, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर, वाराणसी एवं संतरविदासनगर में एक प्रतिशत से भी कम वनावरण है। कृषि प्रधान इस क्षेत्र में अब प्राकृतिक रूप से वनावरण का विस्तार करना असम्भव ही लगता है, किन्तु मानव द्वारा रोपित वृक्षों का विस्तार कर इस कमी की पूर्ति कर पर्यावरण के असंतुलन को रोका जा सकता है। सरकार द्वारा काफी प्रयास भी किए जाते हैं, किन्तु उसमें कितनी सफलता मिलती है, सब लोग जानते हैं। केवल सरकार के भरोसे वृक्षारोपण के लक्ष्य को नहीं पाया जा सकता है, बल्कि इसमें जन-जन को अपनी सहभागिता निभानी होगी। इसे जनान्दोलन के  बनाना होगा। प्रत्येक उत्सव, त्यौहार, पर्व, जन्मदिन, शादी- विवाह या किसी भी शुभ अवसर पर वृक्षारोपण की अनिवार्य रूप से मुहिम चलानी होगी और पुनः अपनी अरण्य संस्कृति को जीवन का अंग बनाना होगा वन महोत्सव के नजरिए से पर्यावरण स्वयंसेवक होने के नाते वृक्षारोपण हेतु कुछ महत्वपूर्ण सुझाव -         

1. अनवरत लेखन के माध्यम से वस्तुस्थिति को अवगत कराते हुए जनजागरूकता पैदा करना।

2. गोष्ठियों, नुक्कण नाटकों, लोकगीतों का आयोजन कर जनजागरूकता उत्पन्न करना। 

3.परिवार के प्रत्येक सदस्य के जन्मदिन पर छोटा-बड़ा कोई भी वृक्ष लगाना और जन्मदिन दिवस वाटिका (बर्थडे गार्डेन) के रूपमें विकसित करना।

4. प्रत्येक उत्सव, त्यौहार, शादी की सालगिरह आदि अवसरों पर वृक्ष लगाना।

5. क्षेत्र में वृक्ष संरक्षण वृक्षारोपण हेतु भ्रमण कर लोगों को जागृत करना और संरक्षण संबंधित विभिन्न योजनाओं से जनता को अवगत कराना ताकि जनता द्वारा उसका लाभ उठाकर वन संरक्षण एवं वृक्षारोपण में महत्वपूर्ण सहभागिता निभायी जा सके।

स्पष्ट है कि किसी भी ऐसे कार्य में हमें तब तक सफलता नहीं मिल सकती, जब तक की उसमें जनसहभागिता सुनिश्चित न हो। वन संरक्षण सबके लिए एवं सबसे जुड़ा कार्य है,अतः इसकी सफलता हेतु जनजागरूकता एवं जनसहभागिता अति आवश्यक है। अंत में-

1. जब तक करेंगे वनों का शोषण, नहीं मिलेगा किसी को पोषण।

2. जब बचेगा वन तभी बचेगा जल, जीव, जमीन एवं जंगल।