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भीषण आपदा है सूखा एवं मरूस्थलीकरण : डाॅ० गणेश पाठक
June 16, 2020 • परिवर्तन चक्र

17 जून को विश्व सूखा एवं मरूस्थलीकरण बचाओ दिवस पर विशेष :-

बलिया। सूखा एवं मरूस्थलीकरण का मानव जीवन, पशु-पक्षी एवं वनस्पतियों सहित पूरे पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी पर इतना घातक प्रभाव डालता है कि इसको भीषण आपदा की श्रेणी में रखा गया है। 

क्या होता है सूखा :-  

सूखा किसी भी क्षेत्र के भू-भाग पर मौसम की उस असामान्य अवस्था को कहा जाता है, जहाँ वर्षा होने की संभावना तो रहती है, किंतु वर्षा हो नहीं पाती है। भारतीय मौसम विभाग द्वारा सूखा की परिभाषा देते हुए कहा गया है कि "सूखा उस दशा को कहा जाता है, जब किसी भौगोलिक क्षेत्र में सामान्य वर्षा से वास्तविक वर्षा 75 प्रतिशत से कम होती है। सूखा कई प्रकार का होता है। जैसे- मौसमी सूखा, जलीय सूखा, कृषि सूखा, सामाजिक- आर्थिक सूखा, मृदा जनित सूखा एवं पारिस्थितिकीय सूखा।

क्या होता है मरूस्थलीकरण :-

           

सूखा की तरह ही मरूस्थलीकरण भी अधिक घातक होता है, जो एक शुष्क पारिस्थितिकी दशाओं वाला भू-भाग होता है। मरूस्थल शब्द 'मरूषद' से बना है,जिसका अर्थ 'मृत्युस्थल' होता है और ऐसी स्थिति उस क्षेत्र में सतही जल के अभाव के कारण होता है। मरूस्थल के प्रसार की प्रक्रिया को ही मरूस्थलीकरण कहा जाता है।

सूखा के कारण - सूखा के कारणों में वर्षा की अनियमितता, मानसून का देरी से आना एवं शीघ्र वापस होना, कम वर्षा का होना, मानसूनी वर्षा में लम्बा अंतराल, तीव्र गति से वन विनाश, परम्परागत फसल चक्र में बदलाव, आधुनिक कृषि, अत्यधिक दोहन के कारण भू-जल स्तर में गिरावट, धरातलीय जल स्रोतों का सूखना, जल का अतिशय उपयोग एवं वर्षा जल सहित अन्य जल स्रोतों का उचित प्रबंधन न होना। ये सभी कारण मरूस्थलीकरण में भी अहम् भूमिका निभाते हैं।

सूखा एवं मरूस्थलीकरण का प्रभाव-सूखा एवं मरूस्थलीकरण अनेक रूपों में न केवल मानव जगत, बल्कि जीव जंतु जगत एवं पादप जगत (वनस्पतियों) को अर्थात् सम्पूर्ण पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। मिट्टी की नमी समाप्त होना, भू-जल स्तर का नीचे खिसक जाना, भूमि की ऊपरी परत का क्षरण होना एवं दरारें पड़ जाना, कृषि फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना एवं कृषि उत्पादकता कम हो जाना,जीव जंतुओं के लिए चारे एवं भोजन की कमी हो जाना,खाद्यान्न की कमी हो जाना, जल संकट उत्पन्न होना, बीमारियों में वृद्धि होना, बेरोजगारी में वृद्धि होना, विस्थापित होना, भुखमरी, रोग एवं कुपोषण के चलते मृत्यु होना, सामाजिक अपराधों में वृद्धि होना, तापमान में वृद्धि हो जाना तथा सम्पूर्ण पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र का असंतुलित हो जाना मुख्य है।

विश्व सूखा एवं मरूस्थलीकरण दिवस से रूप मे जागरूकता उत्पन्न कर बचाव एवं रोकथाम करना-सूखा एवं मरूस्थलीकरण के दुष्प्रभाव को देखते हूए ही संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1994 मे यह निर्णय लिया गया कि  17 जून 1995 से प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व में सूखा एवं मरूस्थलीकरण दिवस मनाकर एवं विभिन्न कार्य योजनाओं को लागू कर इनकी रोकथाम एवं इनसे बचाव हेतु कारगर उपाय किए जायेंगें। इसके लिए प्रति वर्ष एक विशेष थीम के तहत कार्य किया जाता है। इस वर्ष अर्थात् 2020 की थीम है " फुड, फीड एवं फाइबर। अर्थात् विश्व की जनता को स्वस्थ रखने हेतु फाइबर युक्त पौष्टिक भोजन खिलाने की व्यवस्था करना, जिसके लिए हमें सूखा एवं मरूस्थलीकरण पर रोकथाम लगाकर फाइबर युक्त खाद्यान्न उत्पादन पर जोर देना होगा।

वर्तमान समय में अपने देश की 29.32 प्रतिशत भूमि मरूस्थलीकरण में बदल चुकी है। विगत दो दशकों से अपने देश में वर्षा की मात्रा एवं वितरण में अनियमितता भी बढ़ी है। सामान्य से काफी कम वर्षा होने के कारण सूखा की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है। सेंटर फार साइन्स एण्ड इनवायरण्मेंट द्वारा जारी' स्टेट आफ इनवायरण्मेंट इन फिगर्स'-2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार 2003- 05 से 2011-13; के मध्य अपने देश में 18.7 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर मरूस्थलीकरण का फैलाव हुआ है। सूखा प्रभावित 78 जिलों में से 21 जिले ऐसे हैं ,जिनका 50 प्रतिशत से अधिक भूमि मरूस्थल में परिवर्तित हो चुकी है। भारत के कुल मरूस्थलीय क्षेत्र में 0.56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत के प्रसिद्ध थार मरूस्थल के क्षेत्र में प्रतिवर्ष 13000 एकड़ से अधिक भूमि का विस्तार हो रहा है। वर्तमान समय में प्रति मिनट 23 हेक्टेयर उपजाऊ भूमि बंजर भूमि में परिवर्तित हो रही है। 1980 से अब तक धरती की एक - चौथाई भूमि बंजर हो चुकी है ।संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार सूखा एवं मरूस्थलीकरण कू कारण 2025 तक विश्व के दो- तिहाई लोग जल संकट से गुजर रहे होंगे एवं 2045 तक लगभग 13 करोड़ से अधिक लोगों को विस्थापित होना पड़ेगा, जिसका मुख्य कारण सूखा एवं मरूस्थलीकरण से उत्पन्न जल संकट एवं खाद्यान्न की कमी हैना होगा।

सूखा एवं मरूस्थलीकरण से बचाव-सूखा एवं मरूस्थलीकरण से बचाव का सबसे कारगर एवं एकमात्र उपाय अधिक से अधिक धरती को वनाच्छादित करना है। साथ ही साथ जल के अतिशय दोहन एवं शोषण की प्रक्रिया पर रोकथाम लगाकर प्रत्येक तरह के जल स्रोत को सुरक्षित एवं संरक्षित करना होगा। विश्व स्तर पर बाँन चुनोती के तहत विश्व के 150 मिलियन हेक्टेयर गैरवनीकृत एवं बंजर भूमि पर 2020 तक एवं 350 मिलियन हेक्टेयर गैरवर्गीकृत एवं बंजर भूमि पर 2030 तक वनस्पतियों को लगाने का लक्ष्य रखा गया है।

अपने देश में भी 13 मिलियन हेक्टेयर गैरवर्गीकृत एवं बंजर भूमि पर 2020 तक एवं अतिरिक्त 8 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर 2030 तक वनस्पतियों को उगाने का निश्चय किया गया है। इन सबके बावजूद जन जागरूकता उत्पन्न कर ही इस भयावह आपदा को रोका जा सकता है।