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बलिया के भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव डाल रहा है जनसंख्या वृद्धि : डाॅ० गणेश पाठक
July 10, 2020 • परिवर्तन चक्र

विश्व जनसंख्या दिवस, 11 जुलाई पर विशेष :-

बलिया। विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य एवं समग्र विकास शोध संस्थान बलिया के सचिव पर्यावरणविद् डाॅ० गणेश कुमार पाठक ने एक भेंटवार्ता में बताया जनसंख्या वृध्दि का भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण पर विशेष प्रभाव डालता है। किसी भी क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि उसके आर्थिक विकास स्तर,सामाजिक जागरूकता, सांस्कृतिक आधार, ऐतिहासिक घटनाक्रम एवं राजनीतिक विचारधारा की सूचक होती है। एक तरफ जनसंख्या वृध्दि जहाँ मानव जाति के लिए खतरे की घंटी है, वहीं दूसरी तरफ संसाधन आधार भी है, वशर्ते कि उसका समुचित उपयोग किया जाय। इस समस्याओं में सामाजिक समस्या, आर्थिक समस्या एवं पर्यावरणीय समस्या प्रमुख है। वर्तमान समय में जनसंख्या वृद्धि की समस्या सम्पूर्ण विश्व के लिए एक चुनौती है।

यदि हम बलिया जनपद की जनसंख्या वृद्धि को देखें यह तथ्य सामने आता है कि  जनसंख्या बलिया जनपद की जनसंख्या में प्रारंभिक दो दशकों में तो कमी आई ,किंतु उसके बाद के दशकों अर्थात् 1931-2011 तक जनसंख्या में लगातार वृद्धि हुई है।इस तरह 1901 से लेकर 2011 तक जनपद बलिया की जनसंख्या में 195.88 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जो काफी अधिक है, जिससे न केवल इस क्षेत्र का विकास कुंठित हो गया है, बल्कि भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण को भी पूरणरूपेण प्रभावित किया है। कारण कि 1901 में बलिया जनपद की जो जनसंख्या मात्र 989420 थी 2011 तक बढ़कर 3223642 हो गयी। इस अतिशय जनसंख्या वृद्धि ने अनेक समस्याओं को जन्म देकर मानव जीवन के समक्ष अनेक तरह का संकट उत्पन्न कर दिया है।
आर्थिक स्वरूप पर प्रभाव-बलिया की अतिशय जनसंख्या वृद्धि ने अनेक आर्थिक समस्याओं को जन्म दिया है।

जनसंख्या वृद्धि ने मानव जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित किया है,जिसमें भोजन, आवास, स्वास्थ्य एवं शिक्षा सहित पर्यावरण, वांछित साम्य लैंगिक असमानता, दैनिक जीवन में सहभागिता, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं सुरक्षा आदि मुख्य है। किंतु जनसंख्या वृद्धि ने एक तरफ जहाँ जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि किया है, वहीं दूसरी तरफ उसमें असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो गयी है, जिससे कि जनपद की सामाजिक- आर्थिक स्थिति पूर्णरूपेण प्रभावित हुआ है।

जनसंख्या वृद्धि के चलते भोजन में संतुलित पोषक तत्वों की उपलब्धता कम हो यही है, जिससे कुपोषण में वृद्धि हो रही है। निर्बल आयवर्ग में आवास की कमी अभी भी कमी है, जिससे सामाजिक पर्यावरण प्रदूषण में वृद्धि हो रही है। बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि हुई है, जिसके चलते युवापीढ़ी अनैतिक कार्यों की तरफ बढ़ रही है। शिक्षित बेरोजगार युवक रोजगार न मिलने के कारण अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अनैतिक कार्यों को अंजाम देने लगे हैं जिससे नशाखोरी, चोरी, अनाचार, दुराचार, चोरी, डकैती, छनैती आदि बुराइयाँ समाज को जकड़ती जा रही हैं, जिससे हमारा सामाजिक ढाँचा खतरे में पड़ता जा रहा है।

जनसंख्या वृद्धि के कारण सामाजिक विभेदीकरण एवं सामाजिक स्तरीकरण में वृद्धि हो रही है तथा पारिवारिक संगठन में परिवर्तन होकर परिवार विघटित हो रहा है। सामाजिक ढाँचा बदलता जा रहा है एवं समाज में अनेक विसंगतियां उत्पन्न होती जा रही हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि इस बढ़ती हुई जनसंख्या का उपयोग मानव संसाधन के रूपमें करते हुए इसे रचनात्मक कार्यों में लगाया जाए तभी समाज एवं  इस क्षेत्र का भला हो सकेगा अन्यथा भौतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विकृतियां दिन-प्रति दिन बढ़ती जायेंगी एवं फिर सामाजिक विकृतियों के दलदल से निकलना मुश्किल हो जायेगा।