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अंतर्राष्ट्रीय बेविनार मे 'संसाधन व्यक्ति' के रूप में भाग लेकर डाॅ० पाठक ने बढ़ाया बलिया का गौरव
June 8, 2020 • परिवर्तन चक्र

बलिया। एम०डी०पी०कालेज प्रतापगढ़ द्वारा 7-8 जून को आजोजित "इश्यू एण्ड चैलेंजेज आँफ कोविद-19 विद् रिफेरेंस टु रिजनल डेवलपमेंट प्लानिंग स्ट्रेटजीस" नामक अंतर्राष्ट्रीय बेविनार में देश-विदेश के ख्यातिप्राप्त भूगोलविदों एवं पर्यावरणविदों सहित अमरनाथ मिश्र पी०जी०कालेज दूबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य भूगोलविद् एवं पर्यावरणविद् डाॅ० गणेश कुमार पाठक को भी संसाधन व्यक्ति (रिसोर्स परसन) के रूपमें अपना व्याख्यान प्रस्तुत करने हेतु आमंत्रित किया गया था। डाॅ० पाठक ने अपना व्याख्यान भारतीय संस्कृति में क्षेत्रीय नियोजन एवं कोविद-19 का अंतर्संबंधः पूर्वांचल (उ.प्र.) के परिप्रेक्ष्य मे" प्रस्तुत किया। इस बेविनार में ए.एन.एम.पी.जी.कालेज दूबेछपरा, बलिया के असि. प्रोफेसर डाॅ० सुनील कुमार ओझा एवं कुँवर सिंह पी. जी. कालेज बलिया के असि.प्रोफेसर डा०सुनील कुमार चतुर्वेदी ने भी प्रतिभागी के रूपमें अपनी सहभागिता निभाते हुए शोधपत्र प्रस्तुत किया।

डाॅ०पाठक ने अपने व्याख्यान में भारतीय संस्कृति में प्रस्तुत पर्यावरण संरक्षण की संकल्पना को विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए क्षेत्रीय नियोजन में पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कोविद-19 से बचाव हेतु किए गए लाॅकडाउन से पर्यावरण में हुए सुधार एवं प्रदूषणों के स्तर में आयी कमी के परिप्रेक्ष्य में भारतीय संस्कृति की अवधारणा की पुष्टि की।

पूर्वांचल के क्षेत्रीय विकास के संदर्भ में डाॅ० पाठक ने बताया कि पूर्वांचल का क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन विहीन एवं उद्योग विहीन क्षेत्र है। संसाधन के रूपमें इस क्षेत्र के अधिकांश जिलों में मात्र मिट्टी एवं जल ही है। इसलिए यहां की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण कृषि पर जनसंख्या का दबाव अधिक है, जिससे इस क्षेत्र का विकास कुँठित हो गया है। इस क्षेत्र के अधिकांश जिलों में वनावरण एक प्रतिशत से भी कम है, जिससे पर्यावरण की दृष्ट से भी असंतुलित क्षेत्र है। इस तरह यह क्षेत्र विकास में पिछड़ गया है।

डाॅ० पाठक ने पूर्वांचल के समुचित विकास हेतु एक समन्वित योजना के तहत विकास करने का सुझाव प्रस्तुत किया, किन्तु यह विकास पर्यावरणीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए पारिस्थितिकीय विकास, संविकास, संतुलित विकास, सतत विकास एवं संद्धृत विकास की संकल्पनाओं पर निहित होना चाहिए, जो हमारी भारतीय संस्कृति के सिद्धांतों का भी पोषक हो। डाॅ० पाठक ने यह भी बताया कि इस क्षेत्र के विकास में पहले से जो असमानता विद्यमान है, उस पर भी विशेष ध्यान देते हुए एक समान क्षेत्रीय विकास होना चाहिए, ताकि समाज में किसी तरह का असंतोष व्याप्त न हो।

अंत में डाॅ० पाठक ने पूर्वांचल के विकास हेतु खासतौर से कृषि, ग्रामीण औद्योगिकीकरण, समन्वित ग्रामीण विकास, वृद्धिकेन्द्र कूटनीति, निचले स्तर से जैविक समुदायों का संगठन, उत्पादन योजना एवं सेवाएँ, क्षेत्रीय बसाव जटिलताएं, संरचनात्मक सुधार आदि तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक संसाधनों, खनिज संसाधनों, मृदा संसाधन, जल संसाधन, मानव एवं मानव निर्मित संसाधन, भूमि उपयोग, श्रम संसाधन, पूँजी, स्थानीय नेतृत्व, आपदा प्रबंधन एवं पारिस्थितिकीय विकास के संदर्भ में एक समन्वित क्षेत्रीय विकास नियोजन की आवश्यकता है।