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18 सितम्बर से 16 अक्टूबर तक रहेगा अधिकमास, जानिए क्या है पुरुषोत्तम मास और इसका महत्व : आचार्य सुमन जी ओझा
September 17, 2020 • परिवर्तन चक्र • अध्यात्म

तीन साल में एक बार आने वाला भगवान विष्णु का प्रिय अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास इस बार 18 सितंबर से 16 अक्टूबर तक रहेगा। हिन्दू पंचांग के अनुसार मलमास या अधिक मास का आधार सूर्य और चंद्रमा की चाल से है। सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। इन दोनों वर्षों के बीच 11 दिनों का अंतर होता है और यही अंतर तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को दूर करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास आता है व इसी को मलमास कहा जाता है। अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु माने जाते हैं। पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है। इसीलिए अधिकमास को पुरूषोत्तम मास के नाम से भी पुकारा जाता है। शास्त्रों में इस मास में भगवान विष्णु का पूजन कई गुना फलदाई बताया गया है।

अधिक मास में शालिग्राम के पूजन का महत्व :

प्राचीन धर्मग्रंथों में पुरुषोत्तम मास में विष्णु स्वरुप शालिग्राम के साथ श्री महालक्ष्मी स्वरूपा श्री यंत्र का पूजन सयुंक्त रूप से करने का काफी महत्व बताया गया है। पुराणों में शालिग्राम को ब्रह्माण्डभूत श्री नारायण का प्रतीक माना जाता है। पदम पुराण के अनुसार जो शालिग्राम का दर्शन करता है उसे मस्तक झुकाता, स्न्नान कराता और पूजन करता है वह कोटि यज्ञों के समान पुण्य तथा कोटि गोदानों का फल पाता है। इनके स्मरण, कीर्तन, ध्यान, पूजन और प्रणाम करने पर अनेक पाप दूर हो जाते हैं। जिस स्थान पर शालिग्राम और तुलसी होते हैं। वहां भगवान श्री हरि विराजते हैं और वहीं सम्पूर्ण तीर्थों को साथ लेकर भगवती लक्ष्मी भी निवास करती हैं। पदमपुराण के अनुसार जहां शालिग्राम शिलारुपी भगवान केशव विराजमान हैं वहां सम्पूर्ण देवता, असुर, यक्ष तथा चौदह भुवन मौजूद हैं। जो शालिग्राम शिला के जल से अपना अभिषेक करता है,उसे सम्पूर्ण तीर्थों में स्न्नान के बराबर और समस्त यज्ञों को करने समान ही फल प्राप्त होता है। शिवजी ने बताया शालिग्राम की महिमा भगवान कार्तिकेय के पूछने पर भगवान शिव ने शालिग्राम की महिमा का गान करते हुए कहा है कि करोड़ों कमल पुष्पों से मेरी पूजा करने पर जो फल प्राप्त होता है वही शालिग्राम शिला के पूजन से कोटि गुना होकर मिलता है। मेरे कोटि-कोटि लिंगों का दर्शन, पूजन और स्तवन करने से जो फल मिलता है वह एक ही शालिग्राम के पूजन से प्राप्त हो जाता है। जहां इनका पूजन होता है वहां पर किया हुआ दान, स्नान काशी से सौ गुना अधिक फल देने वाला माना गया है। शालिग्राम को अर्पित किया हुआ थोड़ा सा तुलसीपत्र, पुष्प, फल, जल, मूल और दूर्वादल भी मेरुपर्वत के समान महान फल देने वाला होता है।